जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक हलचल बढ़ते ही आतंकी हुए एक्टिव, सुरक्षाबल भी तीन-तरफा ऑपरेशन को तैयार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ सर्वदलीय बैठक की. इस मीटिंग में प्रधानमंत्री ने कहा कि भले ही हमारे ब...
Pm Modi Meeting Jammu Kashmir

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ सर्वदलीय बैठक की. इस मीटिंग में प्रधानमंत्री ने कहा कि भले ही हमारे बीच राजनीतिक मतभेद हों, लेकिन सभी दलों को देश के हित में और जम्मू-कश्मीर के हित में काम करना चाहिए. लेकिन बैठक से बाहर निकलकर जम्मू कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने जो बात कही, वो ना तो देश के हित में है और ना ही जम्मू-कश्मीर के हित में. महबूबा मुफ्ती ने फिर से पाकिस्तान का राग छेड़ दिया और कहा कि अगर जम्मू-कश्मीर के लोगों को ये ठीक लगता है तो पाकिस्तान से बात की जानी चाहिए. दूसरी ओर उमर अब्दुल्ला ने कहा कि एक मुलाकात से दूरियां नहीं घटती हैं. उन्होंने ये भी कहा कि अनुच्छेद-370 की वापसी के लिए कोर्ट जाएंगे.

वैसे बैठक के बारे में दो बातों पर आम राय दिखी. पहली बात ये कि बातचीत बेहत अच्छे माहौल में हुई और दूसरी बात ये कि जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के बाद चुनाव कराए जाएंगे. तीन घंटे से ज्यादा समय तक चली बैठक में सभी नेताओं को अपनी-अपनी बात रखने का मौका मिला. बताया जा रहा है कि बैठक में पूरा जोर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने को लेकर रहा. प्रधानमंत्री ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में जैसे डीडीसी के चुनाव हुए, वैसे ही विधानसभा के चुनाव भी कराए जाएंगे. पीएम ने ये भी कहा परिसीमन के तुरंत बाद राज्य में चुनाव कराए जा सकते हैं और ज्यादातर नेताओं ने इसपर सहमति भी जताई.

प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि लोकतंत्र को आम लोगों के बीच निचले पायदान पर मज़बूत किया जाए. प्रधानमंत्री ने नई पीढ़ी का जिक्र करते हुए कहा कि एक भी व्यक्ति की मौत हो तो ये पीड़ादायक है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में खास तौर पर युवा पीढ़ी को सुरक्षा मिलनी चाहिए. प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि वो दिल्ली की दूरी और दिल की दूरी, दोनों को खत्म करना चाहते हैं. लेकिन, मीटिंग से बाहर निकलकर पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने कहा कि एक मुलाकात से दूरी कम नहीं होगी. दोनों पार्टियों के नेताओं ने अनुच्छेद-370 को हटाने के फैसले को गलत बताया.

चुनाव के बाद राज्य का दर्जा लौटाया जाएगा

मीटिंग में केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया कि कोरोना की वजह से परिसीमन की प्रक्रिया में देरी हुई, लेकिन चुनाव जल्द कराए जाएंगे. इस बैठक के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के चौतरफा विकास के लिए प्रतिबद्ध है. अमित शाह ने ये भी कहा कि सरकार ने संसद में सूबे को पूर्ण राज्य का दर्जा लौटाने का जो वादा किया था, उसके लिए चुनाव कराए जाएंगे. जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ आज जो बैठक हुई, वो अपने किस्म की ऐतिहासिक मीटिंग थी.

ऑल पार्टी मीटिंग के बाद गुरुवार शाम नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें प्रधानमंत्री को लेकर उनके सुर बदले-बदले दिखे. जो नेता पहले मोदी का नाम तक नहीं सुनना चाहते थे. वो अब प्रधानमंत्री से बार-बार मुलाकात को तैयार हैं. श्रीनगर से लेकर दिल्ली तक राज्य और केंद्र में सरकारें बदलीं, बातचीत के कई दौर चले, लेकिन जम्मू-कश्मीर का मसला समाधान तक नहीं पहुंच सका. अब जबकि बदलाव का दौर शुरू हो चुका है, आपको अबतक हुई बैठकों या बातचीत के बारे में बताते हैं.

दशकों से जम्मू-कश्मीर पर बातचीत का दौर जारी

1971 के युद्ध में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी और बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर नया देश बन गया, तब शेख अब्दुल्ला को इस बात का अहसास हुआ कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का उनका ख्वाब शेखचिल्ली के हसीन सपनों से ज्यादा कुछ भी नहीं है. तब शेख ने सोचा कि बातचीत की कश्ती आगे बढ़ानी चाहिए और उन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी के साथ समझौता कर लिया. शेख अब्दुल्ला की तरफ से उनके प्रतिनिधि मिर्जा अफजल बेग थे जबकि इंदिरा गांधी की तरफ से उनके दूत जी पार्थसारथी ने समझौते पर दस्तखत किया. इस समझौते के बाद 25 फरवरी 1975 को शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए.

वर्ष 2001-2002 में कश्मीर में हिंसा का दौर उफान पर था. घाटी में पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन दहशत का खेल खेल रहे थे. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बातचीत बढ़ाने के लिए देश के रक्षा मंत्री रह चुके केसी पंत के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया. पंत कमेटी ने अपनी सिफारिश में कहा कि कश्मीर में सुरक्षा बलों की कम-से-कम तैनाती की जाए और राज्य को अधिक से अधिक स्वायत्तता दी जाए. इसके तुरंत बाद वर्ष 2002 में मशहूर वकील राम जेठमलानी के नेतृत्व में कश्मीर कमेटी का गठन किया गया. इस कमेटी को राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले वहां के अलगाववादियों से बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

2002 के चुनाव के बाद जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और कांग्रेस पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाई थी और मुफ्ती मोहम्मद सईद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने थे. जनवरी 2004 में तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के उदारवादी धड़े के साथ बातचीत की लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला. जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा ने इस बातचीत की मध्यस्थता की थी.

यूपीए सरकार में भी नहीं निकला कोई नतीजा

2004 में लोकसभा चुनाव हुए. कांग्रेस के नेतृत्व में यूपी की सरकार बनी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. मनमोहन सिंह ने 5 सितंबर, 2005 को मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले हुर्रियत के नेताओं से मुलाकात की. 14 जून, 2006 को पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के मुखिया सज्जाद लोन से और 17 फरवरी, 2006 को जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासीन मलिक के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से भी केंद्र सरकार ने बात की लेकिन इन सबका कोई नतीजा नहीं निकला. उस दौरान जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं बढ़ने लगी थीं. तब बातचीत के लिए एक और समिति का गठन किया गया.

2010 में दिलीप पडगांवकर, एमएम अंसारी और राधा कुमार की समिति ने जम्मू-कश्मीर को ज्यादा अधिकार दिए जाने की सिफारिश की, जिसे केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया था. 2014 में केंद्र की सत्ता फिर एनडीए के पास आई. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी. 2017 में पूर्व आईबी चीफ दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर के विभिन्न पक्षों से बात करने की जिम्मेदारी दी गई. शर्मा को कैबिनेट सेक्रटरी का दर्जा दिया गया. उन्हें जम्मू-कश्मीर के जनप्रतिनिधियों और अलग-अलग संगठनों से बात करने की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन इसके दो साल बाद ही, 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में आर्टिकल-370 को खत्म कर दिया. लेकिन कश्मीर पर बातचीत की जो कश्ती बढ़ रही है, उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है.

दो साल से घाटी के नेता राजनीतिक वनवास झेल रहे हैं और जब बुलावा आया तो आज दिल्ली के लिए नेताओं ने दौड़ लगा दी. लेकिन इस मीटिंग के बाद महबूबा मुफ्ती ने एक बार फिर पाकिस्तान का राग छेड़ा. उसी पाकिस्तान का नाम लिया, जिसने बंटवारे के बाद से ही हिंदुस्तान के ताज जम्मू-कश्मीर पर नजरें गड़ा रखी हैं. लेकिन अब घाटी बदल रही है. घाटी से आतंकियों का लगातार सफाया हो रहा है और हर बार की तरह बातचीत से पहले बड़ी आतंकवादी वारदात करने वाला पाकिस्तान चाहकर भी घाटी में कुछ नहीं कर पा रहा है. बावजूद इसके पाकिस्तान ने कोशिश नहीं छोड़ी है.

आतंकवाद को खत्म करने के लिए सरकार की सख्त नीति

जब दिल्ली में ऑल पार्टी मीटिंग चल रही थी, तब जम्मू कश्मीर की सुरक्षा में सख्ती बरती जा रही थी ताकि दहशतगर्द अपने मंसूबों में कामयाब ना हो जाएं. वैसे तो यहां सेना और पुलिस ने 30 साल से जारी आतंक के सफाए के लिए एक नया पैटर्न अपनाया है. वो है कि किसी भी घटना या हमले से पहले आतंकियों को मार गिराना और अगर आंतकी जरा भी मंसूबे में कामयाब हो गए तो जीरो टॉलरेंस. इसका नतीजा ये हुआ कि आतंकी घटनाएं कम हुईं और आतंकी ज्यादा मारे गए. आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के DGP दिलबाग सिंह के मुताबिक वर्ष 2020 में जम्मू-कश्मीर में 100 से ज्यादा ऑपरेशन चलाए गए. इनमें 90 कश्मीर और 13 ऑपरेशन जम्मू में हुए और इस दौरान कुल 225 आतंकी मारे गए. इनमें 207 कश्मीर और 18 जम्मू में मारे गए. इस साल की बात करें तो अब तक 54 दहशतगर्द मारे जा चुके हैं. लेकिन दिल्ली में कश्मीर को लेकर ऑल पार्टी मीटिंग करीब आते ही घाटी में एक बार आतंकी सुगबुगाने लगे. पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को हवा मिलने लगी और सीमा पार से घुसपैठ करने की तैयारी भी शुरू हो गई.

राजनीतिक हलचल बढ़ने से सक्रिय हुए आतंकी

पिछले हफ्ते बारामुला जिले में नशीले पदार्थ और हथियार का ये जखीरा बरामद किया गया. आतंकवादियों की मदद करने वाले 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया और पाकिस्तानी नार्को टेरर मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया. 22 जून की रात आतंकियों ने शोपियां जिले में CID के इंस्पेक्टर परवेज अहमद डार की गोली मारकर हत्या कर दी. एक दिन पहले भी आतंकियों ने शोपियां में ही सुरक्षाबलों पर हमला किया. 23 जून को पुलवामा के राजपोरा चौक पर सीआरपीएफ की पार्टी पर आतंकवादियों ने ग्रेनेड से हमला किया. और 23 जून को ही शोपियां जिले के शिरमल इलाके में सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ के दौरान हिजबुल के एक आतंकी को मार गिराया.

मतलब जम्मू कश्मीर में राजनीतिक हलचल बढ़ने के साथ ही आतंकी एक बार एक्टिव हो गए, जिनसे निपटने के लिए सुरक्षाबलों ने भी कमर कस ली. इस बीच खुलासा हुआ है कि पाकिस्तानी सेना और सीमा पार मौजूद दहशतगर्दों ने कश्मीर में घुसपैठ की बड़ी तैयारी की है. खुफिया सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना पिछले कई दिनों से इस नापाक मिशन के लिए सीमा से सटे इलाकों में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रही है. इस ट्रेनिंग का मकसद जम्मू-कश्मीर में नए सिरे से अशांति फैलाना है.

इस खास ट्रेनिंग को तस्खीर-ए-जबल नाम दिया गया है, जिसका मतलब है पहाड़ पर कब्जा करना. इसके तहत आतंकियों को गुरिल्ला अटैक और हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई है. पाकिस्तानी सेना ने ये ट्रेनिंग रावलकोट में तोलीपीर के इलाकों में करवाई है क्योंकि ये इलाका घुसपैठियों का पुराना रास्ता माना जाता है. दरअसल केंद्र की मोदी सरकार ने इस साल के अंत तक जम्मू-कश्मीर में रुकी हुई राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने का मन बना लिया है. ऐसे में भारतीय खुफिया एजेंसियों को अंदेशा है कि सीमा पार से इन तैयारियों को पटरी से उतारने की कोशिश की जा सकती है, जिसके लिए आतंकी अलग-अलग ग्रुप बनाकर ट्रेनिंग ले रहे हैं.

घाटी में 220 आतंकी एक्टिव- खुफिया एजेंसी

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, इस वक्त घाटी और नियंत्रण रेखा (LoC) के करीब 220 आतंकी एक्टिव हैं. इनमें 170 कश्मीर घाटी में, जबकि 40-50 आतंकी PoK के कैंप्स में हैं. खबर है इन कैंप्स में करीब 90 से 100 आतंकी पाकिस्तानी हैं. ज़्यादातर आतंकी उत्तरी कश्मीर में एक्टिव हैं. लीपा वैली में 6 आतंकी घुसपैठ के लिए तैयार हैं. रामपुर सेक्टर में लश्कर और हिजबुल के एक दर्जन आतंकी, पीर पंजाल में लश्कर के 4 आतंकी, भिंबर गली में लश्कर के 8 आतंकी, नौशेरा में जम्मू-कश्मीर गजनवी फोर्स के 3 आतंकी, गुरेज सेक्टर में हिजबुल के 8 आतंकी. इसके अलावा PoK के ट्रेनिंग कैंप निकियाल में 24 आतकियों को पाकिस्तान सेना के SSG कमांडो ट्रेनिंग दे रहे हैं. इन 24 आतंकियों में जैश-ए-मोहम्मद के 4, अल बद्र के 10 और लश्कर के 10 आतंकी हैं.

इन आतंकियों को कमांडो अबू ताला और निकियाल में तैनात 10वीं सिंध रेजिमेंट का मेजर उमर ट्रेनिंग दे रहा है. आतंकियों ने ग्रेनेड फेंकने, हथियार छीनने के साथ गश्ती और नाका दलों पर हमला कर भागने की रणनीति अपनाई है. हालांकि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के पास आतंकी कैंप्स का पूरा मैप है. और सुरक्षा बल इन आतंकियों के खिलाफ तीन तरफा ऑपरेशन की तैयारी में है. इसी बौखलाहट में आतंकी स्थानीय नेताओं और सुरक्षाबलों को निशाना बना रहे हैं.

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देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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