ऑपरेशन ‘नि:शब्द’: अस्पतालों में आसानी से मिल रहा फेक वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट, TV9 भारतवर्ष की खास रिपोर्ट

इस वक्त हिंदुस्तान में सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सफल होता अभियान है. लेकिन कुछ लोग अपने निजी हित के ...
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इस वक्त हिंदुस्तान में सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सफल होता अभियान है. लेकिन कुछ लोग अपने निजी हित के लिए इस अभियान को असफल बनाने में जुटे हैं. हमारा यह स्टिंग ऑपरेशन ऐसे ही लोगों को सामने लाने का प्रयास है. हम किसी अस्पताल की कार्य क्षमता पर प्रश्न नहीं खड़ा करना चाहते. हमारा मानना है कि देश के सभी अस्पताल पूरी ईमानदारी से कोरोना के खिलाफ मुहिम में लगे हैं. ऑपरेशन ‘नि:शब्द’ का उद्देश्य उस ईमानदारी के बीच बेईमानी करने वाले कुछ लोगों का सच उजागर करना है.

आज नहीं तो कल, देश कोरोना के खिलाफ अपनी जंग में विजयी होगा लेकिन इस दौरान महामारी के जितने मुजरिम हैं, उन्हें ना कानून माफ करेगा और ना ही इंसानियत. क्योंकि चंद रुपयों की खातिर कई लोग कोरोना के खिलाफ सबसे बड़े हथियार यानी वैक्सीन की धार को कुंद करने में जुटे हैं. जिस वैक्सीनेशन प्रोग्राम और डिजिटल प्लेटफार्म का लोहा दुनिया मान रही है, उसको पलीता लगाने में जुटे हैं.

कोरोना काल में देश ने क्या कुछ नहीं देखा. दवाइयों की कालाबजारी देखी, इलाज के नाम पर लूट देखी, ऑक्सीजन के नाम पर लूट देखी, श्मशान में चिताओं के लिए घूस लेने वाले देखे गए और कफन के नाम पर लूट देखी गई. महामारी के ऐसे मुजरिमों को टीवी9 भारतवर्ष लगातार एक्सपोज करता आ रहा है. चंद सिक्कों के लिए, अपने छोटे से फायदे के लिए कुछ बेईमानों ने कोरोना महामारी को भी काली कमाई का जरिया बना लिया है.

हमारे रिपोर्टर्स ने बाहर लाया चार अस्पतालों का सच

ऐसे लोगों का पता लगाने के लिए टीवी9 भारतवर्ष की स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम के रिपोर्टर्स फारुक नेवाजी और उमेश पाटिल निकले. छह दिन तक दोनों अंडरकवर रिपोर्टर्स ने अस्पतालों की खाक छानी और चार अस्पतालों का जो सच निकालकर लाए. वो सच आपको हतप्रभ कर देगा. दरअसल देश में चल रहे टीकाकरण अभियान को सफल बनाने का सबसे ज्यादा दारोमदार सरकारी अस्पतालों पर ही है और वो अपनी जिम्मेदारी बहुत अच्छी तरह निभा भी रहे हैं. लेकिन इन्हीं अस्पतालों में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस वक्त इंसानी वजूद पर मंडरा रहे सबसे बड़े खतरे यानी कोरोना वायरस के खतरे को और खतरनाक बना रहे है. लेकिन कैसे, ये सब कुछ एक-एक कर सामने आएगा.

‘ऑपरेशन नि:शब्द’ के लिए निकली टीम की पहली लोकेशन थी- सिविल अस्पताल, पलवल. हमारी इनवेस्टिगेटिव टीम 19 जून 2021 को दिल्ली से 40 किमी दूर पलवल पहुंची तो हमारे सामने कई सवाल थे. सवाल ये कि- क्या बिना वैक्सीन लगवाए वैक्सीन लगाने का सर्टिफिकेट मिल सकता है? क्या किसी गलत नाम पर, गलत नंबर से वैक्सीन लगाने का सर्टिफिकेट हासिल किया जा सकता है? या फिर, क्या किसी मृत व्यक्ति के नाम पर भी टीका लगाने का प्रमाण पत्र लिया जा सकता है?

इन्हीं सवालों के जवाब की तलाश में हमारे अंडरकवर रिपोर्टर्स पलवल के सरकारी अस्पताल पहुंचे. जहां इनकी मुलाकात एक स्वास्थ्यकर्मी से हुई. यहां हमारी टीम ने बिना टीका लगवाए सर्टिफिकेट लेने के लिए एक काल्पनिक कहानी का सहारा लिया और थोड़ी देर की बातचीत में ही स्वास्थ्यकर्मी ने इसके लिए हामी भर दी.

मौत हो चुके व्यक्ति का वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट

रिपोर्टर ने यहां उन्हें बताया, “हमारे जो कंपनी के एमडी हैं ना, उनको वैक्सीन सर्टिफिकेट चाहिए. उनको शुगर ज्यादा है तो वो वैक्सीन लगाना नहीं चाहते. उनको विदेश जाना है, उसके लिए उन्हें सर्टिफिकेट चाहिए.” इस पर स्वास्थ्यकर्मी ने कहा कि वे पूछकर बताते हैं. स्वास्थ्यकर्मी ने किसी से फोन पर बात की और फिर फोन रखते ही हमसे आधार कार्ड और मोबाइल नंबर मांगा. यानी महज 20 सेकंड की बातचीत में हमें ये भी यकीन हो गया कि यहां गलत नाम से भी वैक्सीन सर्टिफिकेट लिया जा सकता है.

सिविल अस्पताल का स्वास्थ्यकर्मी हमें भरोसा दिला रहा था कि बिना टीका लगवाए, दोनों वैक्सीनेशन का ओरिजिनल सर्टिफिकेट मिलेगा और ये कोविन और उमंग ऐप पर भी दिखेगा. हमने जिस व्यक्ति का वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट लेने का फैसला किया था. उसकी असलियत जानकर आप चौंक जाएंगे. हमने अस्पताल में जो आधार कार्ड दिया. उस व्यक्ति की 27 सितंबर 2020 को ही मौत हो चुकी है और लेकिन महज 1,500 रुपए में हमने एक मुर्दे का वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट हासिल कर लिया.

हमें स्वास्थ्यकर्मी ने भरोसा दिलाया था कि शाम तक दोनों डोज के सर्टिफिकेट वाट्सऐप पर मिल जाएंगे और वो अपने भरोसे पर खरा उतरा. हमारे मोबाइल पर एक मृत व्यक्ति को मृत्यु के बाद टीका देने का प्रमाण पत्र आ गया. इसके बाद हमारी टीम ने उसी स्वास्थ्यकर्मी से दोबारा मुलाकात की. तो उसने हमें दिखा दिया कि वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट सरकारी वेबसाइट पर अपलोड हो चुका है. इस इन्वेस्टिगेशन में तीन बातें साफ हो गईं कि बिना वैक्सीन लगवाए सर्टिफिकेट मिल सकता है, मृत व्यक्ति के नाम पर भी टीका प्रमाण पत्र लिया जा सकता है और किसी के नाम पर किसी दूसरे को टीका लगाया जा सकता है. तीनों ही वैक्सीन महाअभियान के लिए महा-अपराध हैं.

बल्लभगढ़ के सरकारी अस्पताल में भी वही स्थिति

टीवी9 भारतवर्ष की स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम ने अपनी पड़ताल को आगे बढ़ाई. हम पलवल के बाद बल्लभगढ़ के सरकारी अस्पताल पहुंचे क्योंकि हम ये जानना चाहते थे कि मुर्दों को सर्टिफिकेट जारी करने वाला पलवल का सरकारी अस्पताल, देश का इकलौता अस्पताल है या बाकी अस्पतालों का भी कुछ ऐसा ही हाल है. बल्लभगढ़ के अस्पताल में हमारी मुलाकात वहां कोविड जांच केंद्र में काम करने वाले एक स्वास्थ्यकर्मी से हुई. लेकिन जो काल्पनिक कहानी हमने पलवल में बताई थी, उसमें थोड़ा-फेरबदल किया. हमारे कहने भर की देर थी कि उस स्वास्थकर्मी ने फौरन हामी भर दी, लेकिन एक शर्त के साथ.

स्वास्थ्यकर्मी ने कहा कि सारा कुछ ओरिजिनल होगा, हर तरीके से मैसेज आएगा, सिर्फ डोज नहीं लगेगा. मैडम को बोल दिया है डोज नहीं लगाना है, वह एडजेस्ट कर लेंगी. वह डोज किसी और को लग जाएगा. बस आप को डोज नहीं लगेगी, बाकी सारे काम ओरिजिनल होंगे. स्वास्थ्यकर्मी ने सर्टिफिकेट के लिए 1,000 रुपए की मांग की. उसने कहा कि 200, 300 रुपए बचते हैं, 500 रुपये तो रजिस्ट्रेशन करने वाली ले लेती है. 200 रुपये मैडम ले लेती हैं वैक्सीन आउट करने के लिए.

उसके कहे अनुसार हमने उसे एक आधार कार्ड दिया. ये यशपाल गौतम नाम के व्यक्ति का आधार कार्ड का था. और इनकी भी मुत्यु 28 अप्रैल को हो चुकी है. साथ ही हमने उसे एक मोबाइल नंबर दिया. इसके बाद स्वास्थकर्मी एक बार फिर 10 मिनट के लिए अस्पताल के अंदर चला गया और महज 10 मिनट के अंदर हमें एक मृत व्यक्ति को वैक्सीन की पहली डोज लगाने का सर्टिफिकेट मिल गया. बात एक हजार की हुई थी, लेकिन हमने स्वास्थकर्मी को 900 रुपए देते हुए बाकी फैमिली मेंबर्स का भी सर्टिफिकेट लेने का लालच दिया. आगे की कमाई सोचकर वो 100 रुपये का घाटा सहने पर राजी हो गया.

फरीदाबाद जिला अस्पताल सर्टिफिकेट देने से इनकार

हमने अपनी पड़ताल को आगे बढ़ाई. हमारी तीसरी लोकेशन थी फरीदाबाद का जिला अस्पताल, लेकिन हमें सुकून था कि सारे ही अस्पतालों में गोरखधंधा नहीं चल रहा. कुछ अस्पतालों में गलत तरीके से ओरिजिनल सर्टिफिकेट बनाने से इनकार भी किया जा रहा है. हालांकि यहां भी स्वास्थ्यकर्मी की नीयत सौ परसेंट साफ नहीं थी. घबराहट के बावजूद उसने हमसे आधार कार्ड और मोबाइल नंबर मांगा. फिर किसी से फोन पर बात की और फोन रखते ही दो टूक शब्दों में इनकार कर दिया.

हरियाणा के इन अस्पतालों की पड़ताल में ये साफ हो गया कि यहां वैक्सीन से जुड़ा गोरखधंधा खूब फल-फूल रहा है. लिहाजा बिना टीका लगवाए वैक्सीन सर्टिफिकेट वाली तहकीकात को हमने देश के सबसे बड़े प्रदेश की ओर बढ़ाया. यहां भी हमने ये जानने की कोशिश की कि अगर मरे हुए लोग टीका लगवाएंगे तो फिर कोरोना से जंग में कैसे विजय हासिल कर पाएंगे.

बुलंदशहर जिला अस्पताल की हकीकत

ऑपरेशन नि:शब्द की आखिरी लोकेशन थी- जिला अस्पताल, बुलंदशहर. इन्वेस्टिगेशन ऑन होते ही यहां हमारे अंडरकवर रिपोर्टर की मुलाकात कोविड सेंटर में तैनात कर्मचारी से हुई. इसे भी हमने बिना वैक्सीन लगवाए सर्टिफिकेट लेने के लिए काल्पनिक कहानी सुनाई. हालांकि शुरुआत में तो इसने आनाकानी की लेकिन थोड़ी ही देर में फर्जीवाड़े के लिए तैयार हो गया. इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमने स्वास्थ्यकर्मी को एक मृत महिला का आधार कार्ड नंबर दिया.

उसके बताए अनुसार, पूरी प्रक्रिया के बाद हमारे मोबाइल फोन पर वैक्सीन लगने का मैसेज आ जाता है. यानी हरियाणा से यूपी तक हमारी पड़ताल में ये साफ हो गया कि टीकाकरण के पवित्र अभियान में पलीता लगाने के लिए कुछ पापी भी एक्टिव हैं. तो ऑपरेशन नि:शब्द में हमने चार अस्पतालों की पड़ताल की. हमें ये पता लगाना था कि क्या बिना वैक्सीन लिए भी सर्टिफिकेट बनवाया जा सकता है और हमने जिंदा तो छोड़िए, मुर्दों का भी वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट बनवा लिया.

अब आप जरा सोचिए, ये वो ही सर्टिफिकेट है जिसे आपको होटल जाने पर मांगा जा रहा है, सार्वजनिक जगहों पर जाने पर मांगा जा रहा है, दफ्तर जाने पर मांगा जा रहा है और इसलिए मांगा जा रहा है ताकि ये तय किया जा सके कि आप ना तो खुद कोरोना संक्रमित होंगे, ना किसी और को संक्रमित करेंगे. लेकिन जब ऐसे सर्टिफिकेट बनेंगे, तो फिर कोरोना रुकेगा कैसे? हमने इसी मकसद से आपको ये ऑपरेशन दिखाया है. हम संबंधित अथॉरिटी को सचेत करना चाहते हैं कि अगर ये जारी रहा, तो सदी की महामारी को और भी भयंकर होने और उसके प्रकोप से देश को कोई नहीं बचा सकता.

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देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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