US जनरल का दावा- अफगानिस्तान के 212 जिलों पर कब्जा कर चुका तालिबान, समझिए भारत पर क्या होगा इस ‘प्रभुत्व’ का असर

भारत के बॉर्डर से महज 350 किलोमीटर दूर हमारा काबुलीवाला दोस्त दो दशक के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. हम बात अफगानिस्तान की कर रहे हैं. ...
Afghan Soldier

भारत के बॉर्डर से महज 350 किलोमीटर दूर हमारा काबुलीवाला दोस्त दो दशक के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. हम बात अफगानिस्तान की कर रहे हैं. प्रकृति की गोद में बसा ये देश जो दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में से एक ‘सिंधु-सरस्वती’ की खूबसूरत कहानी बयां करता है. जो इतिहास की कई सदियों तक एशिया के व्यापारियों के लिए ‘क्रॉस रोड’ और तमाम संस्कृतियों के लिए ‘मीटिंग प्लेस’ के रूप में जाना जाता रहा है. एक बार फिर बेमौत मर रहा है. अफगानिस्तान जिस आतंक के दलदल से लगभग 20 साल पहले थोड़ा बाहर आता हुआ दिखा था, अब एक बार फिर उसी में धंसने की ओर बढ़ रहा है.

31 अगस्त तक अमेरिका और नाटो की फौज अफगानिस्तान से पूरी तरह लौट जाएगी. ऐसे में यहां तालिबान एक बार फिर तेजी से तबाही और कब्जे की नई पटकथा लिख रहा है. तालिबान का एक मात्र एजेंडा अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा करना है, इसीलिए ये भारत की बड़ी फिक्र है. पिछले 20 साल में भारत ने अफगानिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत किया है और करीब 22 हजार करोड़ रुपए का निवेश किया है. सवाल ये है कि तालिबान के कब्जे के बाद क्या दो दोस्तों के बीच रिश्तों में हुआ ये निवेश पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा? क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान के कमबैक के पीछे पाकिस्तान भी बड़ी भूमिका निभा रहा है.

अफगानिस्तान की धरती पर हर तरफ बेहिसाब बम बरस रहे हैं, रॉकेट लॉन्चर आग उगल रहे हैं. गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा देश थर्रा उठा है. अंतहीन तबाही की ऐसी तस्वीरें आ रही हैं कि हिंदुस्तान समेत पूरी दुनिया सन्न है. वॉर जोन में तब्दील हो चुके पूरे अफगानिस्तान के चप्पे चप्पे में बारूदी धमाके हो रहे हैं. पिछले एक महीने में तालिबान और अफगानी सेना के बीच हर दिन संघर्ष तेज हुआ है. फिक्र ये है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान में हालात और भयावह होने वाले हैं. तालिबान ने अफगानिस्तान की पूरी तरह से घेराबंदी कर ली है.

212 जिलों पर तालिबान जमा चुका है कब्जा- अमेरिकी जनरल

अमेरिकी सेना के जनरल मार्क मिले के मुताबिक, अफगानिस्तान में कुल 34 प्रांत हैं. इन 34 प्रांतों में 419 जिले हैं. इनमें से 212 पर तालिबानियों का कब्जा हो चुका है और ज्यादातर राज्यों की राजधानी पर तालिबान कब्जे के करीब है. अमेरिकी जनरल का दावा ग्राउंड रिपोर्ट पर आधारित है. अफगानिस्तान के सिर्फ चुनिंदा इलाकों और चंद शहरों में सेना और सरकार का प्रभाव बचा है. इन इलाकों में ही अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार कायम है. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल भी इसी इलाके में आती है. अब तक काबुल पर तालिबानी दहशतगर्दों ने चढ़ाई नहीं की है, लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि तालिबान के टारगेट पर काबुल नहीं है. असल में तालिबानी आतंकी काबुल को फतह करने की योजना पर ही आगे बढ़ रहे हैं.

तालिबान ने काबुल जाने वाले सभी रास्तों पर कब्जा कर लिया है. काबुल की हर बॉर्डर पोस्ट पर तालिबान ने अपना कैंप बनाया है. तालिबानी काबुल में हथियार और बाकी सैन्य सामानों की सप्लाई को ठप कर अफगान सरकार और सेना को सरेंडर करने के लिए मजबूर करना चाहते हैं. यही वजह है कि तालिबान ने सिर्फ काबुल ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को जोड़ने वाले हेरात, फराह, कंधार, कुंदुज, तखर और बदख्शां प्रांतों में कई बड़े हाईवे और बॉर्डर पोस्ट पर कब्जा कर लिया है.

इन रास्तों से 2.9 बिलियन डॉलर का आयात-निर्यात किया जाता है. ऐसे में अमेरिका को भी आशंका है कि कहीं तालिबान का पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा ना हो जाए. मार्क मिले के मुताबिक, “ऐसा संभव है कि तालिबान पूरी तरह से कब्जा कर ले. इसके अलावा भी कई चीजें हो सकती हैं. हम बहुत नजदीक से हालात को देख रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि अंत लिखा जा चुका है.”

स्पिन बोल्डक में 100 निर्दोष नागरिकों की हत्या

तालिबान इलाके पर कब्जे के साथ खूनी खेल भी खेल रहा है. कंधार प्रांत के स्पिन बोल्डक में तालिबान ने 100 निर्दोष नागरिकों की बेरहमी से हत्या कर दी है. तालिबान के खौफ से 100 लोगों की लाशें कई घंटे तक जमीन पर पड़ी रही. तालिबान ने इन इलाकों में कब्जा करने के बाद आम लोगों के घरों को लूट लिया, वहां अपने झंडे फहराए और मासूमों को मौत के घाट उतार दिया. तालिबान की ये बर्बरता रूह को झकझोरती है. आने वाला वक्त और डरावना हो सकता है. लेकिन सबसे बड़ी फिक्र ये है कि तालिबान के इस खूनी खेल में पाकिस्तान का भी सपोर्ट है.

अफगानिस्तान के स्पिन बोल्डक बॉर्डर क्रॉसिंग एरिया, जहां अब तालिबान का कब्जा है. यहां तालिबान के साथ पाकिस्तान का झंडा भी देखा गया है. हालांकि अफगानिस्तानी सेना भी इन इलाकों में पलटवार कर रही है और उसे अमेरिकी वायु सेना का साथ मिल रहा है. अफगान सेना के लिए अमेरिका मददगार बना हुआ है और तस्वीरें भी इसकी गवाही दे रही हैं. अमेरिकी वायु सेना और अफगानी सेना के ज्वाइंट ऑपरेशन में 100 से ज्यादा तालिबानी लड़ाके मारे भी गए हैं. तालिबान पर इन इलाकों में खासतौर से कांधार में ताबड़तोड़ अटैक का मकसद अफगान सेना की मदद करना और आतंकियों के कब्ज़े से अफगानी इलाकों को आज़ाद कराना है.

धार्मिक आंदोलन के तौर पर हुआ था तालिबान का उभार

अफगानिस्तान आज नहीं, बल्कि 1980 के बाद से ही जंग का मैदान बना हुआ है. पहले सोवियत यूनियन, फिर उसके बाद अमेरिका ने यहां अपनी मर्जी चलाने की कोशिश की लेकिन इस मुल्क की जमीन पर किसी विदेश ताकत के पैर नहीं टिक पाए. करीब 3.8 करोड़ की आबादी वाले अफगानिस्तान में 99 फीसदी मुसलमान हैं और इसमें से 42 फीसदी आबादी पश्तून मूल के लोगों की है. 27 फीसदी आबादी ताजिक मूल के लोगों की है. बाकी 31 फीसदी आबादी में हजारा, नूरिस्तानी, एमाक, तुर्क और बलोच शामिल है.

आबादी के इस संतुलन में अफगानिस्तान में विदेशी ताकतों की हार और तालिबान की जीत का राज छिपा है. जब सोवियत यूनियन के पैर अफगानिस्तान में लड़खड़ाने लगे थे, तब तालिबान एक धार्मिक आंदोलन के तौर पर सामने आया. मकसद था सुन्नी मुसलमानों का सुधार. लेकिन जैसे-जैसे साल गुजरते गए तालिबान आतंकी संगठन के रूप में मजबूत होता गया और एक वक्त ऐसा आया जब अफगानिस्तान का मतलब तालिबान हो गया. अब अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ते ही यही हालात फिर बन गए हैं.

विमान अपहरण के वक्त भारत ने तालिबान से किया संपर्क

ऐसे में तालिबान भारत के लिए भी बड़ी फिक्र बन गया है. सवाल उठने लगा है कि अगर अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान का कब्जा हो जाता है तो भारत पर इसका क्या असर होगा. जैसे-जैसे अफगानिस्तान में तालिबान से जंग तेज हो रही है, भारत और अफगानिस्तान के बीच रिश्तों को लेकर सस्पेंस भी बढ़ता जा रहा है. इस सवाल के साथ कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान का दबदबा बढ़ा तो 20 सालों में दोनों देशों के बीच गहरी हुई दोस्ती का क्या होगा. क्योंकि जब जब अफगानिस्तान में तालिबान की ताकत बढ़ी है, भारत के अफगानिस्तान से संबंध अच्छे नहीं रहे.

साल 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान के दो-तिहाई हिस्से पर तालिबान का कब्जा था. इस दौरान दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं थे. भारत ने तालिबान की हुकूमत को मान्यता भी नहीं दी थी. यहां तक कि भारत के राजनयिकों ने देश छोड़ दिया था. पहली बार साल 1999 में भारत सरकार ने तालिबान के साथ संपर्क किया था. वो भी तब जब भारत के यात्री विमान का अपहरण हुआ था. विमान को अफगानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर ले जाया गया था. ये इलाका उस वक्त तालिबानी लड़ाकुओं के कब्जे में था. इसलिए अपहरण करने वालों और भारत के बीच तालिबान मध्यस्थता कर रहा था. फिर उसके बाद भारत सरकार और तालिबान के बीच किसी भी तरह का कोई औपचारिक राजनयिक संपर्क नहीं रहा.

20 सालों में भारत ने हजारों करोड़ निवेश किए

भारत के तालिबान के साथ अच्छे संबंध नहीं होने की एक वजह पाकिस्तान भी है. क्योंकि पाकिस्तान हमेशा से तालिबानी लड़ाकों का मददगार रहा है. बताया ये भी जा रहा है कि साल 1990 में अफगानी आतंकवादी कश्मीर आए थे. पूरी दुनिया जानती है पाकिस्तान की मदद के बिना अफगानी आतंकियों का जम्मू-कश्मीर में आना संभव नहीं था. एक खबर के मुताबिक, अभी भी अफगानिस्तान के साथ चल रहे संघर्ष में भी पाकिस्ताने के 21 आतंकी संगठन तालिबानी आतंकियों के साथ लड़ रहे हैं.

सिक्के के दूसरे पहलू को देखें तो अफगानिस्तान की सरकार के साथ भारत के संबंध काफी अच्छे रहे हैं. पिछले 20 सालों में भारत ने अफगानिस्तान में विभिन्न परियोजनाओं में हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च किए हैं. साल 2015 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफगानिस्तान की संसद की नई इमारत का उद्घाटन किया था. 2016 में अफगानिस्तान के हेरात प्रांत में 42 मेगावाट वाली बिजली और सिंचाई की परियोजना का उद्घाटन पीएम मोदी और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने संयुक्त रूप से किया था. 2020 के नवंबर में भारत ने अफगानिस्तान में 150 नई परियोजनाओं का ऐलान किया था. चाहे वो पाकिस्तान के साथ संबंध की बात हो, पाकिस्तानी आतंकियों से कनेक्शन की बात हो, तालिबान हर लिहाज से भारत के लिए खतरा रहा है.

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देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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