Iran-Iraq War: ईरान को कब्जाने की चाह में मुंह के बल गिरा इराक का ‘तानाशाह’, 20वीं शताब्दी का सबसे लंबा युद्ध, 10 लाख से ज्यादा लोग उतारे गए थे मौत के घाट

आज से ठीक 41 साल पहले इराक ने ईरान (Iran) पर आक्रमण कर दिया था. 22 सितंबर 1980 वो दिन था, जब इराकी सेना ने पश्चिमी ईरान की सीमा में घुसपैठ ...
Iran-Iraq War

आज से ठीक 41 साल पहले इराक ने ईरान (Iran) पर आक्रमण कर दिया था. 22 सितंबर 1980 वो दिन था, जब इराकी सेना ने पश्चिमी ईरान की सीमा में घुसपैठ कर दोनों देशों के बीच एक भयानक युद्ध को हवा दे दी थी. इराक (Iraq) और ईरान के बीच छिड़ा यह युद्ध 20वीं शताब्दी का सबसे लंबा पारंपरिक युद्ध बताया जाता है. इस युद्ध में दोनों पक्षों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा था. दोनों देशों के बीच ठनी दुश्मनों में 10 लाख के करीब लोग मारे गए थे और हजारों लोग केमिकल हथियारों के इस्तेमाल से मौत के घाट उतारे गए थे.

इराक और ईरान (Iran-Iraq War 1980–88) के आपसी संबंध कभी अच्छे नहीं रहे. दोनों देशों के बीच शुरू हुई यह जंग आठ साल तक चली थी. हालांकि इराक ने दावा किया था कि युद्ध 4 सितंबर को तब शुरू हुआ था, जब ईरान ने कई सीमा चौकियों पर गोलाबारी करनी शुरू कर दी थी. 1988 के युद्धविराम से लड़ाई समाप्त हो गई थी. हालांकि सामान्य राजनयिक संबंधों की बहाली और सैनिकों की वापसी 16 अगस्त 1990 को औपचारिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने तक नहीं हुई थी.

खुजेस्तान के तेल उत्पादक सीमा क्षेत्र पर कब्जा चहता था इराक

इस युद्ध की जड़ें इराक-ईरान के बीच कई क्षेत्रीय और राजनीतिक विवादों तक फैलीं थीं. इराक खुजेस्तान के तेल उत्पादक सीमा क्षेत्र पर अपना कब्जा स्थापित करना चहता था. यह एक ऐसा क्षेत्र था, जो बड़े पैमाने पर जातीय अरबों से भरा हुआ था. जिस पर इराक अपना अधिकार चाहता था. इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अपने देश की संप्रभुता को ‘शत अल-अरब’ के दोनों किनारों पर फिर से स्थापित करना चाहते थे. शत अल-अरब, टाइग्रिस (दजला) और यूफ्रेट्स (फरात) नदियों के संगम से बनी एक नदी थी जो ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के बीच की सीमा थी.

सद्दाम, ईरान की इस्लामी क्रांतिकारी सरकार द्वारा इराक के शिया बहुसंख्यकों के बीच विद्रोह को भड़काने की कोशिश को लेकर भी चिंतित थे. इराक ने ईरान की नई सरकार के स्पष्ट अव्यवस्था और अलगाव का फायदा उठाया. इसके बाद, ईरानी आतंकवादियों द्वारा तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा करने और ईरान के नियमित सशस्त्र बलों के मनोबल और विघटन को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ टकराव हुआ.

इराक की बढ़त को ईरान से मिली सख्त चुनौती 

ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद देश एक इस्लामिक गणराज्य बन गया. वहीं, इराक के ‘तानाशाह’ सद्दाम हुसैन को लगा कि क्रांति के बाद ईरान की सेना कमजोर हो गई है. ऐसे में ये हमला करने का सही समय है. 22 सितंबर 1980 को, खुजेस्तान के तेल उत्पादक सीमा क्षेत्र पर इराकी सैनिकों ने जमीनी आक्रमण किया. इसके बाद इराकी वायुसेना ने ईरानी हवाई ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए. शुरुआत में ईरान पर की गई ये चढ़ाई इराक के लिए फायदेमंद साबित हुई. इराक ने खुर्रमशहर शहर पर कब्जा कर लिया और नवंबर तक अन्य हिस्सों पर भी कब्जा जमा लिया.

मगर इराक की बढ़त को जल्द ही ईरान की ओर से चुनौती मिलने लगी. आम सैनिकों से साथ रेवोल्यूशनरी मिलिशिया ने इराक के खिलाफ हमला शुरू किया. 1981 में ईरान ने एक जवाबी हमला किया. फिर 1982 की शुरुआत में उन्होंने लगभग सभी खोए हुए क्षेत्र को फिर से हासिल कर लिया. उस वर्ष के अंत तक, इराकी सेना युद्ध से पहले बनी सीमा रेखा पर वापस आ गई. वहीं, अब इराक ने शांति की तलाश करने का प्रयास किया. मगर अयातोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, ताकि सद्दाम को सत्ता से बेदखल किया जा सके. जुलाई 1982 में ईरान ने इराक के बसरा पर कब्जा करने का असफल प्रयास किया.

दोनों मुल्कों ने शहरों, सैन्य ठिकानों पर किए हवाई हमले

ईरान अब आक्रामक हो चुका था और इराकी सुरक्षा मजबूत हो गई थी. अधिकतर युद्ध सीमा के साथ ही लड़ा जा रहा था. दोनों मुल्कों ने शहरों, सैन्य ठिकानों और तेल सुविधाओं पर हवाई हमले किए. हालात इस कदर बिगड़ गए कि अमेरिकी और अन्य पश्चिमी मुल्कों को तेल उत्पादन को स्थिर रखने के लिए फारस की खाड़ी में जंगी जहाज भेजने पड़े. ईरान के पास संख्याबल था तो वहीं इराक के पास आधुनिक हथियार. इराक को सऊदी अरब, कुवैत, अमेरिका समेत अन्य अरब देशों का साथ मिला. वहीं, ईरान को सिर्फ सीरिया और लीबिया का सहयोग मिला. इराक लगातार शांति की बात कर रहा था.

1988 की वसंत तक ईरान अपने सालों से किए जा रहे असफल आक्रमणों से निराश हो चुका था. वहीं, इराक ने जमीनी हमलों की एक श्रृंखला शुरू कर दी थी. इराक जिस तेजी से अब बढ़त बना रहा था. उससे ईरान के धार्मिक नेताओं को लगने लगा कि उन्हें इस युद्ध में निर्णायक जीत नहीं मिलने वाली है. उसी साल जुलाई में दोनों देश सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 598 के तहत संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता वाले युद्धविराम को स्वीकार करने पर सहमत हुए. हालांकि, 20 अगस्त 1988 को ये युद्ध आधिकारिक रूप से समाप्त हुआ. हालांकि, इस युद्ध में तक तक 10 लाख लोगों की मौत हो चुकी थी.

इतिहास में 22 सितंबर की तारीख में दर्ज कई ऐसी ही घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा:

1539: सिख संप्रदाय के पहले गुरु नानक देव जी का करतारपुर में निधन. पाकिस्तान स्थित इस जगह को अब डेरा बाबा नानक के नाम से जाना जाता है.

1599: लंदन के फाउंडर हॉल में 21 व्यापारियों की बैठक हुई, जिसमें भारत के साथ कारोबार के लिए एक नयी कंपनी (ईस्ट इंडिया कंपनी) स्थापित करने के बारे में चर्चा की गई.

1903: अमेरिकी नागरिक इटालो मार्चिओनी को आइसक्रीम कोन के लिए पेटेंट मिला.

1914: मद्रास बंदरगाह पर जर्मनी के युद्धपोत इम्देन ने बमबारी की.

1949: सोवियत संघ ने परमाणु बम का सफलतापूर्वक परीक्षण किया.

1955: ब्रिटेन में टेलीविजन का व्यावसायीकरण शुरू.

1965: भारत पाकिस्तान के बीच संयुक्त राष्ट्र की पहल पर युद्ध विराम.

1966: अमेरिकी यान सर्वेयर 2 चंद्रमा की सतह से टकराया.

1977: विश्व प्रसिद्ध खिलाड़ी पेले के नेतृत्व में अमेरिका की कोसमोस फुटबॉल टीम दो प्रदर्शनी मैच खेलने के लिए कलकत्ता पहुंची.

1979: जमात-ए-इस्लाम संगठन के संस्थापक सदस्य मौलाना अब्दुल अली मौदूदी का निधन.

1980: ईरान और इराक के बीच चल रहा सीमा संघर्ष युद्ध में बदला.

1988: कनाडा सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और कनाडा के नागरिकों की नजरबंदी के लिए माफी मांगी.

1992: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बोस्निया और हेरजेगोविना के बीच युद्ध में भूमिका के लिए यूगोस्लाविया को निष्कासित किया.

2011: भारतीय योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब मानने से इंकार किया.

2011: भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मंसूर अली खान पटौदी का निधन.

2018: ईरान में वार्षिक सैन्य परेड पर आतंकवादियों का हमला, महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 29 लोग मारे गए. हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी.

2020: दिग्गज मराठी अदाकारा आशालता वाबगांवकर का निधन.

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देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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Iran-Iraq War: ईरान को कब्जाने की चाह में मुंह के बल गिरा इराक का ‘तानाशाह’, 20वीं शताब्दी का सबसे लंबा युद्ध, 10 लाख से ज्यादा लोग उतारे गए थे मौत के घाट
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