जिसे अधमरा करके छोड़ दिया वही मासूम 7 साल बाद कातिल मामा की ‘सजा-ए-मौत’ की वजह बना

दीपावली की रात हुए लोमहर्षक कांड में अदालत ने मंगलवार को अपना फैसला सुना दिया. यह फैसला अब से करीब 7 साल पहले उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादू...
death sentence

दीपावली की रात हुए लोमहर्षक कांड में अदालत ने मंगलवार को अपना फैसला सुना दिया. यह फैसला अब से करीब 7 साल पहले उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में एक ही परिवार के 4 लोगों के सामूहिक कत्ल के मामले में सुनाया गया है. फैसले में अदालत ने आरोपी को ‘सजा-ए-मौत’ यानी फांसी की सजा मुकर्रर की है. एक रात में एक ही मकान में अकेले ही किसी किशोर द्वारा चार-चार कत्ल की घटना को अंजाम देने से तो देहरादून शहर तब कांप ही उठा था. अब जब 7 साल बाद अदालत ने मुजरिम को जो सजा सुनाई मंगलवार दोपहर बाद पूरे शहर में उसका भी चर्चा रहा. सात साल बाद जिस बिना पर अदालत ने कातिल को मौत की सजा मुकर्रर की.

वो भी अपने आप में कम हैरान करने वाली नहीं हैं. कोर्ट ने घटना के समय पांच साल की उम्र के मासूम बालक रहे और रिश्ते में मुजरिम के भांजे की गवाही को महत्वपूर्ण माना. लिहाजा बच्चे की गवाही को सर्वोपरि रखते हुए कोर्ट ने एक रात में चार कत्ल के आरोपी मुजरिम (रिश्ते में बच्चे का मामा) को मंगलवार को फांसी की सजा सुना दी. घटना वाली रात मुजरिम ने इस मासूम बच्चे को भी छुरे से लहूलुहान कर दिया था. आरोपी चूंकि बच्चे से बेहद प्यार करता था. लिहाजा तरस खाकर हत्यारे ने जिस पांच साल के मासूम भांजे को उस पर रहम खाकर जिंदा छोड़ दिया. अब सात साल अदालत में चली कानूनी लड़ाई के बाद उसी मासूम भांजे की गवाही ने, मुजरिम मामा को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का भी इंतजाम कर दिया.

दीवाली की वो मनहूस काली रात

इन तमाम तथ्यों की पुष्टि मंगलवार को सरकारी वकील राजीव गुप्ता ने भी देहरादून में मीडिया से की. घटनाक्रम के मुताबिक 23-24 अक्टूबर सन् 2014 को देहरादून की आदर्श नगर कालोनी के एक मकान में, रात के वक्त उस लोमहर्षक चौहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया था. सामूहिक हत्याकांड और हत्या की कोशिश का मुकदमा तब देहरादून के थाना कैंट में दर्ज किया गया था. जिस मकान में चार चार लोगों को एक साथ चंद मिनट में दीवाली की रात कत्ल कर डाला गया वो होर्डिंग बिजनेसमैन जय सिंह का था. जय सिंह ने दो शादी की थीं. पहली पत्नी उनसे एक बेटे के साथ अलग रह रही थी. जबकि जिस मकान में जय सिंह के बेटे हरमीत सिंह (जय सिंह की पहली पत्नी का बेटा) कत्ल-ए-आम मचाया.

ऐसे खुला चार कत्ल का राज

उस मकान में जय सिंह दूसरी पत्नी कुलवंत कौर, बेटी हरजीत कौर, पांच साल के नाती कंवलजीत सिंह (जिसे आरोपी ने घटना वाली रात छुरा मारने के बाद ममता के चलते अधमरी हालत में जिंदा छोड़ दिया), व तीन साल की नातिन सुखमणि और पहली पत्नी के दूसरे बेटे हरमीत सिंह (चार लोगों की हत्या का मुजरिम) के साथ देहरादून वाले मकान में ही रहते थे. दीवाली के अगले दिन की सुबह घर से कोई भी बाहर नहीं निकला था. सुबह के वक्त नौकरानी घर में काम करने पहुंची. उसने घर के अंदर हरमीत सिंह (हत्यारोपी) को खून सना चाकू लिए हुए खड़े देखा. हरमीत के पास ही खून से लथपथ हालत में डरा-सहमा उसका पांच साल का भांजा कंवलजीत सिंह खड़ा हुआ था. यह सब देखकर नौकरानी चीख मारकर घर से बाहर भाग गई.

मकान में चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थीं

आसपास के लोगों ने घर के अंदर जाकर देखा तो घर के मुखिया जय सिंह. उनकी दूसरी पत्नी कुलवंत कौर, बेटी हरजीत कौर, हरजीत कौर की 3 साल की बेटी सुखमणि की खून से लथपथ लाशें बिखरी पड़ी थीं. पड़ोसियों ने देखा कि चार चार कत्ल के हत्यारोपी हरमीत सिंह (घर के मुखिया जय सिंह की पहली पत्नी का दूसरा बेटा) के हाथ भी अपनों को छुरे से कत्ल करने के वक्त बुरी तरह से लहूलुहान हो चुके थे. मौके पर पहुंची पुलिस ने आरोपी को मय छुरे के गिरफ्तार कर लिया. एक घर में चार कत्ल का मुख्य गवाह बनाया गया उसी 5 साल के और घटनास्थल पर घायल हालत में जिंदा बचे मासूम कंवलजीत सिंह को. तीन महीने में ही पुलिस ने कोर्ट में आरोप-पत्र दाखिल कर दिया. मुकदमे का ट्रायल अपर जिला जज (पंचम) आशुतोष मिश्रा की अदालत में चला.

मासूम की गवाही के सामने हर दलील बौनी

ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि चार-चार कत्ल का आरोपी मानसिक रूप से बीमार था. उसका इलाज चल रहा था. लिहाजा उसकी सजा में नरमी बरती जाए. मगर पड़ताल में पुलिस ने बचाव पक्ष की सभी दलीलों को खारिज करवा देने में सफलता पाई. अंतत: अन्य तमाम गवाह सबूतों के साथ सजा सुनाने वाली कोर्ट ने सबसे ज्यादा वजन, उसी मासूम कंवलजीत और घटना के एक एकमात्र चश्मदीद की गवाही को दिया जो किस्मत से उस रात खुद भी अधमरा होने के बाद भी कातिल के हाथों बेमौत मरने से बच गया था. मामले में यूं तो कहने को 21 गवाह पेश किए गये थे. वादी की ओर से भी वकील बीडी झा कोर्ट में पेश होकर अपने मुवक्किल को सजा से बचाने की तमाम दलीलें देते रहे. मगर आरोपी के खिलाफ मासूम की गवाही को ही कोर्ट ने सजा सुनाने के दौरान सबसे ज्यादा अहमियत दी.

बेटे की बेईमान चाहत बनी तबाही की वजह

चार चार हत्याओं को अंजाम देने वाले मुजरिम को सजा सुनाने के वक्त अदालत ने धारा 316 के तहत सामने रखे गए तथ्यों को भी प्रमुखता दी थी. जिसके तहत पुलिस ने बताया था कि हत्यारोपी ने बहन का जब कत्ल किया तो वो गर्भवती थी. उसके गर्भ में मौजूद बच्चे की भी मौत हो गई थी. उस लोमहर्षक कांड में मार डाले गए जय सिंह के भाई अजीत सिंह जोकि मुकदमें में शिकायतकर्ता भी थे, की गवाही को भी कोर्ट ने मुजरिम के खिलाफ ही माना. घटना वाली रात जय सिंह की जो बेटी हरजीत कौर कत्ल की गई दरअसल वो उनके भाई और मुकदमे में शिकायतकर्ता अजीत सिंह की बेटी थी. अजीत सिंह ने अपनी बेटी हरजीत कौर घटना वाली रात कत्ल कर डाले गए भाई जय सिंह को गोद दे रखी थी. एक रात में पूरे परिवार के खात्मे की वजह संपत्ति विवाद था. जय सिंह की पहली पत्नी का बेटा (मुजरिम) हरप्रीत सिंह दरअसल जल्दी से जल्दी पिता की संपत्ति अपने नाम करवाना चाहता था.

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राष्ट्रीय समाचार: जिसे अधमरा करके छोड़ दिया वही मासूम 7 साल बाद कातिल मामा की ‘सजा-ए-मौत’ की वजह बना
जिसे अधमरा करके छोड़ दिया वही मासूम 7 साल बाद कातिल मामा की ‘सजा-ए-मौत’ की वजह बना
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