1971 War: पाकिस्तान के सबसे बड़े सरेंडर की कहानी, 13 दिन की वॉर में रोया ‘नियाजी’-ढाका से धोया हाथ

1971 में हुई भारत-पाकिस्तान जंग आज ही के दिन हुई थी. पाकिस्तान की सेना ने भारतीय फौज के सामने हथियार डालने का फैसला किया था. 15 दिसंबर 1971...
1971 War

1971 में हुई भारत-पाकिस्तान जंग आज ही के दिन हुई थी. पाकिस्तान की सेना ने भारतीय फौज के सामने हथियार डालने का फैसला किया था. 15 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के जनरल नियाज़ी ने जनरल मानेकशॉ के सरेंडर के ऑफर को कबूल कर लिया था. इसके बाद 16 दिसंबर को जो हुआ वो दुनिया में इतिहास बन गया. पाकिस्तान दो हिस्सों में टूट गया. बांग्लादेश नया राष्ट्र बन गया. 16 दिसंबर को बांग्लादेश हर साल विजय दिवस मनाता है, लेकिन इस बार बांग्लादेश अपनी आजादी का स्वर्ण जंयती समारोह मना रहा है.

इस मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बांग्लादेश के दौरे पर हैं. वो स्पेशल गेस्ट के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. आज उन्होंने बांग्लादेश के अपने काउंटर पार्ट अब्दुल हामिद से मुलाकात की. प्रधानमंत्री शेख हसीना से भी मिले. ढाका में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया. 21 तोपों की सलामी दी गई, लेकिन इस दौरे का पूरा सार भारत और बांग्लादेश की दोस्ती के साथ. भारत और पाकिस्तान के बीच हुए उस युद्ध को भी याद करना है, जिसमें पाकिस्तान की शर्मनाक हार हुई और बांग्लादेश अस्तित्व में आया. कुछ तस्वीरें काल के कपाल पर कभी धुंधली नहीं पड़तीं. कुछ कहानियां इतिहास को नए सिरे से लिखती हैं, गढ़ती हैं और ये तस्वीरें तो अपने आप में ऐसी कहानी है, जिसमें पाकिस्तान के दो हिस्सों में टूटने का और बांग्लादेश के जन्म का सार छिपा है. इन तस्वीरों की इनसाइड स्टोरी को समझने के लिए 50 साल पीछे चलना होगा. तारीख थी 16 दिसंबर 1971.

पाकिस्तान की सेना के 93 हजार सैनिकों ने भारतीय फौज के सामने सरेंडर किया था. पाकिस्तान के जनरल ने भारतीय अफसर के सामने घुटने टेक दिए थे. वो फूट फूट कर रो रहे थे. ये दूसरे विश्वयुद्ध के बाद किसी देश की सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण था. सोचिए सरेंडर वाले टेबल पर इतने हथियार थे, इतना असलहा था, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल था, लेकिन ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारतीय फौज की रणनीति, अदम्य साहस और जज्बे का पाकिस्तान के पास कोई जवाब नहीं था. .

असल में भारत की इस विजय गाथा और पाकिस्तान की इस सबसे बड़ी हार की पटकथा उसी दिन लिखी जानी शुरू हो गई थी जब पाकिस्तान की सेना ने भारत की फौज को ललकारने का दुस्साहस किया था. 3 दिसंबर 1971 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कोलकाता में थीं. वहां पब्लिक मीटिंग को एड्रेस कर रही थी. इसी दौरान शाम के ठीक 5 बजकर 40 मिनट पर पाकिस्तान की तरफ से बमबारी शुरू हुई. पाकिस्तान ने एरियल अटैक किया. इस अटैक का कोड नेम ऑपरेशन चंगेज़ खान था. तब पाकिस्तानी एयरफोर्स के लड़ाकू विमानों ने पठानकोट, श्रीनगर अमृतसर और जोधपुर के मिलिट्री एयरबेस को टारगेट किया. उस वक्त पाकिस्तान की कमान जनरल याहया खान के हाथ में थी. एक साथ 11 एयरबेस पर अटैक हुआ था.

अंबाला, आगरा, जोधपुर, उत्तरलई, अवंतीपोरा, फरीदकोट, हलवाड़ा और सिरसा में भी प्रिएम्टिव स्ट्राइक्स की गईं. युद्ध का बिगुल बज चुका था. जब ये खबर इंदिरा गांधी को मिली तो तुरंग दिल्ली वापस लौटने का फैसला किया. चूंकि युद्ध की सूरत में दिल्ली में ब्लैक आउट था. इसलिए 11 बजे उनका विमान पालम एयरपोर्ट पर उतरा. तुरंत इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई. इसके बाद उन्होंने देश को संबोधित किया. युद्ध शुरू हो चुका था.

पाकिस्तान सेना को रौंदने के लिए भारतीय वायुसेना ने भी पाकिस्तानी बेसों पर अटैक किया. जवाबी कार्रवाई की, लेकिन इस दौरान वेस्टर्न फ्रंट से ज्यादा अब पूर्वी मोर्चे की लड़ाई अहम हो गई क्योंकि मुक्तिवाहिनी के आंदोलन को देखते हुए ये लड़ाई पाकिस्तान के लिए काफी निर्णायक साबित होने वाली थी. उस दौरान भारतीय सेना की कमान जनरल सैम मानेकशॉ के हाथ में थी. प्रधानमंत्री के इंस्ट्रक्शन मिलने के बाद जनरल ने अपने अफसरों को एंगेज किया. पूर्वी कमान से स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब से हॉटलाइन पर बात की. ऑर्डर दिए कि बिना वक्त गंवाए दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दिया जाए.

पहला निर्देश दिया गया कि भारतीय सेना को सबसे पहले खुलना और चटगांव पर कब्जा करना है. असल में उस वक्त भारतीय सेना के जवाब ढाका के बाहर मौजूद थे, लेकिन पहला ऑर्डर ये था कि जिन इलाकों को बायपास करती हुई सेना आगे आई पहले उनपर कब्जा करना है. सेना ने जनरल का ऑर्डर माना. जंग ने देखते ही देखते भीषण रूप अख्तियार कर लिया.

अगले छह दिनों तक भारत और पाकिस्तान की सेना के बीच हर जबरदस्त जंग हुई. जल, थल और नभ से जिस तरह के हमले हुए. उससे पाकिस्तान बैकफुट पर आ गया. 4 और 5 दिसंबर की रात पाकिस्तान के कराची पोर्ट पर हमारी नौसेना ने ट्राइडेंट नाम से सरप्राइज अटैक किया. उस दौरान भारत के पास उसा मिसाइल बोट्स थी, जिन्होंने पाकिस्तान के तीन जहाजों को काफी नुकसान पहुंचाया. आठ और नौ दिसंबर को इसी तरह के हमले को रिपीट किया. तब पाकिस्तान के फ्यूल टैंक्स तक बर्बाद कर दिए थे. इसी तरह तब बंगाल की खाड़ी में भी पाकिस्तान की सारी कोशिशों क नाकाम कर दिया गया. पाकिस्तान की 7 गनबोट्स, एक सबमरीन, दो डिस्ट्रॉयर, 18 कार्गो, सप्लाई और कम्युनिकेशन वेसल्स ध्वस्त कर दिए.

भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 60 से 75 एयरक्राफ्ट कर दिए थे खत्म

इसी तरह एरियल ऑपरेशंस के दौरान भी. पाकिस्तान को वेस्टर्न और ईस्टर्न दोनों सेक्टर में काफी नुकसान हुआ. पाकिस्तान के 60 से 75 एयरक्राफ्ट खत्म हो गए और जहां तक पाकिस्तानी एयरफोर्स के पायलट का सवाल है तो इनमें से कई युद्धबंदी बना लिए गए, लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने तब के बर्मा यानी आज के म्यामांर में जाकर अपनी जान बचाई थी. जब धीरे धीरे पाकिस्तान को ये एहसास होने लगा कि उसकी फौज ढाका में उसकी आर्मी भारतीय सेना के सामने टिक नही पाएगी और ऐसा इसलिए भी था क्योंकि जिन मुक्तिवाहिनी के लड़ाकों को भारतीय सेना ने ट्रेनिंग दी थी. उन्होंने भी पाकिस्तान के हमलों को काउंटर करना शुरू कर दिया था. तब पाकिस्तान ने अमेरिका से मदद की गुहार लगाई थी.

ये बात सही है कि तब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तान की मदद के लिए बंगाल की खाड़ी में अपने एक वॉरशिप USS एंटरप्राइज को उतार दिया था, लेकिन इसका जवाब भारत के पास था. चूंकि जंग से ठीक पहले भारत और तब के सोवियत संघ के बीच समझौता हो चुका था. इसलिए जैसे ही अमेरिका का वॉरशिप आया, तभी सोवियत संघ ने भी व्लाडीवोस्टक से क्रूजर और डिस्ट्रॉयर वॉरशिप्स को भेज दिया. इसके साथ साथ एक न्यूक्लियर सबमरीन को भी हिंद महासागर में उतार दिया.

अब बैलेंस और मूमेंटम पूरी तरह हिंदुस्तान के फेवर में था और ये बात अमेरिका को भी समझ आ चुकी थी इसलिए अमेरिका ने भारत को एशिया की मई महाशक्ति के तौर पर स्वीकार कर लिया. इधर पाकिस्तान के पास जब कुछ नहीं बचा तो नौ 9 दिसंबर 1971 को तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल मानेकशॉ ने पाकिस्तान को पहला रेडियो मैसेज दिया. उन्होंने कहा, ‘भारतीय सेनाओं ने आपको चारों तरफ से घेर लिया है. आपको उनसे कोई मदद मिलने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. चिटगांव, चालना और मांग्‍ला बंदरगाह ब्‍लॉक हो चुके हैं. कोई भी समंदर के रास्ते आप तक नहीं पहुंच सकता. आपकी किस्मत बंद हो चुकी है. मुक्ति बाहिनी और बाकी लोग आपसे बदला लेने के लिए तैयार बैठे हैं. आप क्यों जिंदगियों को बर्बाद करना चाहते हैं. किसी सैनिक के सामने अपने हथियार डालना कोई असम्मान की बात नहीं है.’

16 दिसंबर को जनरल नियाजी ने डाले हथियार

पाकिस्तान को सरेंडर की कॉल जा चुकी थी. अब फैसला पाकिस्तान को करना था. पाकिस्तान के जनरल को करना था, लेकिन जनरल मॉनिकशॉ चाहते थे कि अब ज्यादा खून खराबे के बगैर पाकिस्तान हथियार डाल दे. इसलिए उन्होंने 11 दिसंबर, 13 दिसंबर को सरेंडर के लिए कहा. कहते हैं कि 13 दिसंबर को जो बात हुई वो चेतावनी के लहजे में थी. जनरल मॉनिकशॉ ने कहा था कि हथियार डाल दो, वर्ना आपको खत्म कर देंगे, लेकिन 14 दिसंबर को ढाका में बड़ा डेवलपमेंट हुआ. तब ढाका के गवर्नर एएम मलिक सीक्रेट मीटिंग करने वाले थे, लेकिन उसी दौरान भारतीय वायुसेना ने ताबूत में आखिरी कील ठोंकी. गवर्नर हाउस पर तीस मिनट में लगातार तीन हमले कर दिए. सैकड़ों रॉकेट दागे. गवर्नर हाउस का सबकुछ खत्म हो गया. इसके बाद 15 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के पूर्वी कमान के जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी ने आत्मसमर्पण का फैसला किया.

तय किया गया कि भारतीय सेना की मौजूदगी में 16 दिसंबर को जनरल नियाजी को हथियार डालने होंगे. 16 दिसंबर 1971 को जनरल जैकब ने जनरल नियाजी को सरेंडर की शर्तें पढ]कर सुनाई. तब नियाजी की आंख से आंसू बह रहे थे, लेकिन जनरल जैकब ने कहा कि तीस मिनट में फैसला करना होगा. वर्ना ढाका पर बमबारी शुरू हो जाएगी. बाद में शर्ते मान ली गई. जिस वक्त ढाका के रेसकोर्स मैदान में सरेंडर हो रहा था तब जनरल नियाजी को कहा गया कि वो तलवार सरेंडर करें, लेकिन उनके पास तलवार नहीं थी इसलिए एक पिस्तौल देकर सरेंडर करवाया. शाम 4.31 मिनट पर ले. जनरल जेएस अरोडा के सामने जनरल नियाजी ने साइन किए. ठीक उसी वक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. वो देश बाद में बांग्लादेश कहलाए जाने लगा.

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देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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