Thakur Roshan Singh:”आप मेरे लिये रंज न करें मेरी मौत अफसोस के लायक नहीं खुशी के काबिल होगी”

बात है सन् 1921-22 की. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने अंग्रेजी हुकूमत (British Rule in India)की बगावत में असहयोग आंदोलन (non-cooperation...

बात है सन् 1921-22 की. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने अंग्रेजी हुकूमत (British Rule in India)की बगावत में असहयोग आंदोलन (non-cooperation movement) चला रखा था. समूचे हिंदुस्तान के नौजवान उस आंदोलन को कामयाब बनाने के लिए अपना घर-मढ़ैया बेचने पर उतारू थे. ब्रिटिश हुकूमत से सीधे-सीधे मोर्चा लेने वाले हजारों-लाखों हिंदुस्तानी लड़के यानी नौजवान उस आंदोलन के चलते हिंदुस्तानी जेलों में ठूंसे जा चुके थे या फिर ठूंसे जा रहे थे.

भारत के उन गरम मिजाज बहादुरों की उसी बेतहाशा भीड़ में एक वह दिलेर लड़का भी शामिल था जिसकी रोंगटे खड़ी कर देने वाली हसरतों, और जिंदादिली की बातें उसकी मौत के 94 साल बाद आज मैं आपके साथ यहां बांट रहा हूं. किसी मजबूरी या स्वार्थ के वशीभूत होकर नहीं. उस रणबांकुरे की याद में और सम्मान में.गुलाम भारत की आजादी के भूखे 35 साल के बहादुर शहीद ठाकुर रोशन सिंह (Thakur Roshan Singh) की दिलेरी की कहानी. वही ठाकुर रोशन सिंह जिन्होंने उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक अंग्रेज पुलिस कर्मी की बंदूक छीनकर वहां मौजूद भीड़ के ऊपर ही गोलियां झोंक दी थीं. उस जुर्म की सजा मुकर्रर की गई दो साल का सश्रम यानि ब-मशक्कत कारावास. बरेली सेंट्रल जेल (Bareilly Central Jail) में सजा काटने के बाद घर वापसी हुई ही थी.

तभी सन् 1924 में ठाकुर रोशन सिंह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन ( Hindustan Republican Association)से जुड़ गए. उसी रिपब्लिकन एसोसियेशन से जिसके कर्णधार थे युवा क्रांतिकारी शाहजहांपुर के पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Pandit Ram Prasad Bismil), अशफाक उल्ला खां (Ashfaqulla Khan ), राजेंद्र नाथ लाहिरी (Rajendra Nath Lahiri) से हिंदुस्तान की आजादी के दीवाने. और काले इरादों वाली गोरों की ब्रिटिश हुकूमत (British Rule in India)के दुश्मन.

दिलेरों की टोली में सबसे उम्र-दराज

क्रांतिकारियों के उस संगठन में यूं तो सभी नौजवान थे. उम्र के लिहाज से मगर ठाकुर रोशन सिंह (Thakur Roshan Singh)उन दिलेरों की हमजोली टोली में सबसे बड़े थे. 22 जनवरी सन् 1892 को शाहजहांपुर जिले के नबादा गांव में जन्म लेने वाले ठाकुर रोशन सिंह के पिता ठाकुर जंगी सिंह और मां कौशल्या को जब बेटे के अंग्रेजों के खिलाफ बागी होने की भनक लगी.

तो उन्होंने उसकी पीठ ठोंकी और आशीर्वाद दिया कि, “अपने कतरे की हर बूंद भारत में काले इरादे लेकर धोखे से घुस आए गोरों को तबाह करने में होम कर देना.” बस फिर क्या था. अचूक निशानेबाज, अनुभवी और चतुर ठाकुर रोशन सिंह को जब मां-पिता की ओर से अंग्रेजों को तबाह करने की खुली छूट मिल गई. तो उसके बाद उन्होंने फिर कभी अपनी या अपनों की कोई परवाह जीवन की अंतिम सांस तक नहीं की.

देश की खातिर डाका भी डाल दिया

नतीजा यह रहा है कि 35-36 साल के बेखौफ ठाकुर रोशन सिंह ने अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में मुंहतोड़ जबाब देने की हसरत में 25 दिसंबर सन् 1924 को क्रांतिकारी संग हमजोलियां की . उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के बमरौली में एक सूदखोर व्यापारी के यहां डाका डाल दिया. डाके की उस घटना में 4 हजार जैसी मोटी रकम और सोना-चांदी हाथ लगा. यहां मैं जिक्र उन्हीं ठाकुर रोशन सिंह का कर रहा हूं जिनकी, हमेशा पंडित राम प्रसाद बिस्मिल से बहादुर क्रांतिवीर के साथ.

इसी बात को लेकर हंसी-ठिठोली हुआ करती थी कि, उन दोनो में से मां भारती को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने की लड़ाई में. पहले किसकी गर्दन मांगी जाएगी. जिसकी गर्दन पहले चाक होगी वही मां का पहला और बड़ा लाल कहलाएगा. बहरहाल बमरौली डकैती कांड में तो ठाकुर रोशन सिंह ब्रिटिश हुक्मरानों के हाथ नहीं लगे.

देश का दिलेर काकोरी कांड में था या नहीं एक पहेली

उसके बाद उनका नाम ले आया गया 9 अगस्त सन् 1925 को काकोरी ट्रेन डकैती कांड (Kakori Train Robbery) में.  26 सितंबर सन् 1925 को उन्हें उस ट्रेन लूट कांड में ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया. इतिहास पलटने पर उसके कुछ पन्नों पर यह भी लिखा हुआ पढ़ने को मिलता है कि, काकोरी में ट्रेन से ब्रिटिश हुकूमत का खजाना लूटने के मामले में ठाकुर रोशन सिंह का सीधे सीधे कोई हाथ नहीं था. हां, उनकी शक्ल उस कांड में शामिल केशव चक्रवर्ती से हू-ब-हू मिलती जुलती थी.

केशव चक्रवर्ती तो गोरी सरकार के हाथ नहीं लगे. लिहाजा गोरों की गूंगी-बहरी अदालत में मौजूद जज ने ठाकुर रोशन सिंह की एक नहीं सुनी. लिहाजा उनकी हर दलील को खारिज करते हुए काकोरी ट्रेन लूट कांड के दौरान हुए एक कत्ल के आरोप में सजा-ए-मौत सुना डाली गई. कत्ल के उस मामले में जो ठाकुर रोशन सिंह के हाथों अंजाम ही नहीं दिया गया था.

रोशन सिंह संग तीन अन्य रणबांकुरों को फांसी

बहरहाल 9 अगस्त सन् 1925 को अंजाम दी गई काकोरी ट्रेन लूट की घटना में ठाकुर रोशन सिंह के साथ तीन अन्य रणबांकुरों को भी फांसी की सजा मुकर्रर की गई. वे तीन बहादुर थे पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिरी. ब्रिटिश हुकूमत ने तय किया था कि इन चारों को क्रमश: गोरखपुर, इलाहाबाद और गोण्डा जेल में फांसी के फंदे पर 19 दिसंबर सन् 1927 को टांग दिया जाएगा.

हुआ मगर इसके उलट. आजादी के वे चारों सजायाफ्ता मतवाले कहीं ऐन टाइम पर यानि फांसी वाले दिन जेल से गायब न हो जाएं. इस आशंका से खौफजदा ब्रिटिश हुकूमत ने गोण्डा जेल में बंद राजेंद्र नाथ लाहिरी को तय तारीख से दो दिन पहले ही. यानी 17 दिसंबर सन् 1927 को ही फांसी के फंदे पर लटका कर हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया.

वो मनहूस 19 दिसंबर 1927

जबकि इन्कलाबी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को एक ही तारीख में फांसी के फंदे पर लटकाया गया. वो तारीख थी 19 दिसंबर 1927. इन बीर सपूतों की कहानियों से भरे पड़े इतिहास के पन्नों को पलटने पर पढ़ने को मिलता है कि, इलाहाबाद जेल में फांसी लगाए जाने से पहले 6 दिसंबर सन् 1927 को ठाकुर रोशन सिंह ने एक खत अपने दोस्त के नाम लिखा था. जिसका मजमून उस जमाने में हिंदुस्तान के हर बच्चे की जुबान पर हू-ब-हू रट गया था.

मेरी मौत अफसोस के लायक नहीं

इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी. भगवान से प्रार्थना है कि वह आपको प्रेम का बदला दे. आप मेरे लिये रंज हरगिज न करें. मेरी मौत खुशी का बाइस यानि कारण होगी. दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है. दुनिया में बदफैली यानी पाप करके अपने को बदनाम न करें. और मरते वक्त ईश्वर की याद रहे. यही दो बातें होनी चाहिये. ईश्वर की कृपा से मेरे साथ ये दोनों बातें हैं. इसलिये मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है. दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ. इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला. इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही. मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ. हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की.”

इसलिए 94 साल बाद भी नहीं भूला देश

मां भारती के पावों में अपनी जिंदगी की हर घड़ी, हर खुशी न्योछाबर कर….हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटक जाने वाले ऐसे रणबांकुरे ठाकुर रोशन सिंह से बिरले शहीद सपूत की शहादत के मौके पर. अब 94 साल बाद जमाना आज यानी 19 दिसंबर 2021 को एक बार फिर शिद्दत के संग याद कर रहा है. यह शायद ठाकुर रोशन सिंह से रणबांकुरे की हिंदुस्तान को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के वास्ते की गई उनकी तपस्या का ही प्रतिफल होगा. जोकि आज तक उन्हें और उनकी शहादत को हिंदुस्तानी नमन और याद करते हैं.

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