कानपुर में हुआ था अंग्रेजों का नरसंहार, 133 क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी लगाकर अंग्रेजों ने लिया था बदला

मेरठ में सुलगी क्रांति की चिंगारी कानपुर पहुंचते-पहुंचते शोला बन चुकी थी, यहां के वीर सपूतों का खून खौलने लगा था, विद्रोही सैनिकों ने अंग्र...
Kanpur 1857

मेरठ में सुलगी क्रांति की चिंगारी कानपुर पहुंचते-पहुंचते शोला बन चुकी थी, यहां के वीर सपूतों का खून खौलने लगा था, विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजों के बंगलों में आग लगाई, नवाबगंज जाकर सरकारी खजाना लूटा, जेल से भारतीय कैदियों को छुड़वा लिया. बिठूर के पेशवा बाजीराव द्वितीय के निधन के बाद उनके दत्तक पुत्र नानाराव को अंग्रेजों ने पेशवा की उपाधि नहीं दी, उन्होंने इसे जबरदस्ती ले लिया और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया. दोतरफा दबाव का असर दिखा, अंग्रेज टूटने लगे और उन्होंने कानपुर छोड़ने का निर्णय लिया. नाना राव ने उन्हें इसकी अनुमति भी दे दी. एक बारगी लगा कि कानपुर अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पा लेगा, लेकिन ये हो न सका. TV9 की इस खास सीरीज में आज हम आपको बताते हैं कि कैसे कानपुर में अंग्रेजों का नरसंहार हुआ और उसका अंग्रेजों ने कैसे बदला लिया.

… जब खून से लाल हुई गंगा, घाट का नाम रखा गया ‘मैस्कर’

मैस्कर का अर्थ होता है हत्याकांड, 1857 से लेकर आजादी के बाद तक कानपुर के छावनी क्षेत्र में स्थित इस गंगा घाट का नाम मैस्कर था, क्योंकि यही वो स्थान है जहां अंग्रेजों का भीषण नरसंहार हुआ था. ‘कानपुर का इतिहास’ पुस्तक के मुताबिक उस वक्त घाट पर गंगा खून से लाल हो गई थीं. हुआ यूं था कि जब अंग्रेजों को ये लगने लगा कि विद्रोही सिपाहियों और क्रांतिकारियों से जीतना मुमकिन नहीं है तो उन्होंने 1857 के जून माह में नानाराव पेशवा से एक समझौता किया, इसके मुताबिक अंग्रेजों ने इलाहाबाद जाने की अनुमति मांगी. पेशवा ने इसके लिए हामी भर दी और सत्तीचौरा घाट पर अंग्रेजों के लिए 40 नावों का प्रबंध कराया. उनकी सुरक्षा के लिए सैनिक तैनात किए. अंग्रेजों ने नाव पर सवार होना भी शुरू कर दिया.

अंग्रेजों की एक गलती बनी नरसंहार का कारण

सब ठीक चल रहा था, तभी अचानक घाट पर स्थित महादेव मंदिर पर बिगुल जैसी आवाज हुई, अंग्रेज समझ नहीं पाए और उन्होंने इसे युद्ध के ऐलान की आवाज मानकर गोली चलानी शुरू कर दी. ऐसा करते ही नाविकों ने गंगा में छलांग लगा दी और अंग्रेज बीच में फंस गए. ऐसा कहा जाता है कि विद्रोही सिपाहियों ने भी आत्मरक्षा में फायरिंग की जिससे कई अंग्रेजों की मौत हो गई. इस घटना का दोषी कौन रहा ये तो अभी तक साफ नहीं हुआ है, लेकिन अंग्रेज नानाराव को इसका दोषी मानते रहे. इतिहास में इस घटना को सत्तीचौरा कांड का नाम दिया गया. इस घटना के बाद ही सत्तीचौरा घाट का नाम बदलकर मैस्कर घाट कर दिया गया था, वर्तमान में इसका नाम नानाराव घाट है.

अंग्रेजों की पत्नियों और बच्चों की हत्या

क्रांति के इतिहास में कानपुर की माटी का योगदान बहुत रहा, लेकिन एक घटना ने इसे कलंकित कर दिया. वो घटना कानपुर के बीबीघर में घटी थी. यहां अंग्रेजों की पत्नियों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया था. दरअसल सत्ती चौरा घाट पर नरसंहार के दौरान ही नानाराव ने किसी तरह विद्रोहियों के कब्जे से अंग्रेजों की पत्नियों और बच्चों को छुड़वा लिया और उन्हें बीबीघर में रखवाया, इनकी देखरेख का जिम्मा हुसैनी खानम को दिया गया. इधर सत्तीचौरा कांड के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों पर और जुल्म करना शुरू कर दिए, इससे गुस्से में आकर हुसैनी ने महिलाओं और बच्चों की हत्या करवाकर उन्हें कुएं में फिंकवा दिया.

इंग्लैंड तक सुनाई दी गूंज

सत्तीचौरा और बीबीघर कांड की गूंज इंग्लैंड तक सुनाई दी. इलाहाबाद छावनी से अंग्रेजों की और सेना भेजी गई और क्रांतिकारियों की धर पकड़ शुरू कर दी गई, आम लोगों को भी सताया जाने लगा. हत्याएं की जाने लगीं, तमाम बागियों को फांसी पर लटकाया गया. विद्रोह को दबाने और कानपुर पर फिर से कब्जा करने के लिए कई दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा.

भारतीयों से साफ कराया जाता था बीबीघर का खून

कानपुर पर दोबारा कब्जा करने वाले जनरल नील और मेजर जनरल हैवलॉक बहुत ही निर्मम अफसर थे. इसीलिए दोनों को यहां भेजा गया था. खास बात ये थी उस समय अंग्रेज अफसरों को ही मुकदमा लिखने और सजा सुनाने का अधिकार था. इन दोनों ने भारतीय लोगों को बहुत प्रताड़ित किया. वह भारतीयों को पकड़ते थे और उन्हें बीबीघर ले जाकर वहां पर पड़े खून के निशानों को साफ कराते थे.

एक साथ दी 133 क्रांतिकारियों को फांसी

सत्तीचौरा और बीबीघर कांड के बाद अंग्रेज बुरी तरह बौखला गए थे, भारतीयों पर जुल्म बढ़ा दिए गए और क्रांतिकारियों की धरपकड़ की जाने लगी, इस दौरान अंग्रेजों ने कई क्रांतिकारियों को पकड़ा और उन्हें फांसी की सजा दी गई, किसी को गोली मार दी गई, केंद्र सरकार की आजादी का अमृत महोत्सव वेबसाइट के अनुसार 133 क्रांतिकारी ऐसे रहे, जिन्हें बरगद के पेड़ पर एक साथ लटकाकर फांसी दी गई. यह पेड़ कानपुर के नानाराव पार्क में था, जिसे बूढ़ा बरगद के नाम से जाना जाता था. कुछ साल पहले क्रांति की ये निशानी ढह गई. अब यहां बूढ़ा बरगद का इतिहास बखान करता एक शिलापट लगा है, जो लोगों को क्रांतिकारियों और कानपुर की वीर माटी की तासीर के बारे में बताता है.

बूढ़े बरगद का दर्द….

1992 में बूढ़े बरगद पर एक शिलापट लगाया था, जो इसका दर्द बयां कर रहा है….
‘सुनो, मैं केवल जड़, तना और पत्तियों से युक्त वट वृक्ष ही नहीं बल्कि गुलाम भारत में आज तक के इतिहास का साक्षी हूं. मैंने अनगिनत बसंत व पतझड़ देखे, 4 जून 1857 का वह दिन भी देखा जब मेरठ में सुलगी आजादी की चिंगारी कानपुर में शोला बन गई थी. मैंने नाना साहब की अगुवाई में तात्या टोपे की वीरता देखी, रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान देखा और अजीमुल्ला की शहादत देखी. देश की आजादी के दीवानों पर क्रूर एवं दमनपूर्ण कहर ढाए जाने से मेरी जड़ें हिल गईं. वह दिल दहला देने वाला दिन मैं आज भी नहीं भूल पाता जब 133 देश भक्तों को अंग्रेजों ने मेरी शाखाओं पर फांसी के फंदे पर लटकाया था. उस दिन मैं बहुत चीखा, चिल्लाया, आंखों के आंसू रो-रोककर सूख गए, यह रोमांचकारी दर्द भरी दास्तान याद आते ही मैं कराह उठता हूं’

नाना साहब ने किया था नेतृत्व

कानपुर में क्रांति का नेतृत्व बाजीराव पेशवा द्वितीय के दत्तक पुत्र नानाराव ने किया था. वह आजीवन अंग्रेजों से संघर्ष करते रहे. इतिहासकारों के मुताबिक उनका जन्म 19 मई 1824 को हुआ था. उनकी माता का नाम गंगा बाई और पिता का नाम नारायण भट्ट था. बचपन में ही उन्हें बाजीराव पेशवा द्वितीय ने अपना दत्तक पुत्र घोषित कर दिया था. बाजीराव पेशवा द्वितीय कानपुर के पास स्थित बिठूर किले में रहते थे, नानाराव की भी शिक्षा-दीक्षा यहीं हुई. यहीं पर उन्हें युद्ध कला में पारंगत किया गया और तलवार और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया गया. 1951 में पेशवा बाजीराव का निधन होने के बाद जब अंग्रेजों ने नानाराव को पेशवा की उपाधि नहीं दी तो उनकी अंग्रेजों से ठन गई और 1957 में जब मेरठ से विद्रोह शुरू हुआ तो नाना राव ने भी खुद को पेशवा घोषित कर अंग्रेजों का खुलकर विरोध शुरू कर दिया और कानपुर में क्रांति के अगुवा बने. आजीवन इन्होंने अंग्रेजों से संघर्ष किया. कई बार अंग्रेजों ने इन पर ईनाम भी घोषित किया, लेकिन कभी सफलता नहीं मिल सकी, नाना साहब का निधन कब हुआ यह आज भी एक रहस्य है.

देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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Nishpaksh Mat

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राष्ट्रीय समाचार: कानपुर में हुआ था अंग्रेजों का नरसंहार, 133 क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी लगाकर अंग्रेजों ने लिया था बदला
कानपुर में हुआ था अंग्रेजों का नरसंहार, 133 क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी लगाकर अंग्रेजों ने लिया था बदला
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