Azadi Ka Amrit Mahotsav :1857 में 11 दिन आजाद रहा था प्रयागराज, कर्नल नील ने बनारस से आकर किया था दोबारा कब्जा, 1930 के बाद फिर उखड़ने लगे थे अंग्रेजों के पैर

मेरठ में क्रांति का बिगुल बजने के बाद देश के तमाम हिस्सों में क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हो गईं थीं, कानपुर में नरसंहार किए जाने की खबर पाक...
Khusro Bagh

मेरठ में क्रांति का बिगुल बजने के बाद देश के तमाम हिस्सों में क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हो गईं थीं, कानपुर में नरसंहार किए जाने की खबर पाकर अंग्रेज बुरी तरह बौखला गए थे, ठीक इसी समय प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में भी क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. 7 जून 1857 को शहर अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त करा लिया गया और तहसीलदार, थानेदार और कोतवाल पद भारतीय क्रांतिकारियों को दे दिया गया. मेरठ, कानपुर के बाद प्रयागराज में मिली इस पराजय को जीत में बदलने के लिए बनारस से कर्नल नील को भेजा गया, जिसने 11 दिन बाद एक बार फिर प्रयागराज अपने कब्जे में ले लिया. इसके लिए उसने यहां के लोगों पर खूब जुल्म किए और क्रांतिकारियों को सरेराह पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई. विद्रोह के हीरो रहे मौलवी लियाकत अली को कई साल बाद गिरफ्तार किया जा सका और उन्हें काला पानी की सजा देकर अंडमान जेल में भेज दिया गया था. हालांकि इस शहर में कभी क्रांतिकारी गतिविधियां बंद नहीं हुईं और 1930 के बाद एक बार फिर स्वतंत्रता आंदोलन ने तेजी पकड़ी और अंग्रेजों के पैर यहां से उखड़ने लगे थे.

खुसरोबाग में फहराया गया था क्रांति का झंडा

प्रयागराज के लोगों ने मौलवी लियाकत अली को क्रांति का नेता चुना और उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ऐसी व्यूह रचना की कि पहले ही वार में अंग्रेज बुरी तरह परास्त हो गए. दरअसल उस समय अंग्रेजों ने गंगा किनारे स्थित किले को अपनी छावनी बनाया था. क्रांतिकारियों ने इसे ही सबसे पहले निशाना बनाया, क्योंकि यहीं पर अंग्रेजी सेना के हथियार, गोला बारूद और खजाना था. अच्छी बात ये थी कि उस समय यहां पर छठीं रेजीमेंट देशी पलटन और फिरोजपुर रेजीमेंट सिख दस्ते के सैनिक लगाए गए थे. यानी कि उस समय किले पर अंग्रेज सिपाहियों की संख्या कम थी, बस अंग्रेज अधिकारी ही तैनात थे. लियाकत अली ने क्रांतिकारियों के साथ बैठक के बाद 6 जून को किले पर आक्रमण का ऐलान कर दिया. यहां मिली जीत के बाद खुसरोबाग में क्रांति का झंडा फहराया गया था.

प्रयागराज के पंडों ने सैनिकों को भड़काया

कारतूस में चर्बी को लेकर मंगल पांडे विद्रोह कर चुके थे, मेरठ में भी इसे लेकर विद्रोह हुआ था, ऐसे में प्रयागराज के पंडों (घाट पर पूजा पाठ कराने वाले) ने अंग्रेजी सेना में तैनात भारतीय सैनिकों को भड़काना शुरू किया. जब क्रांतिकारियों ने 6 जून 1857 को किले पर आक्रमण कर दिया तो क्रांति का जोश देख सैनिक भी भड़क गए और विद्रोह में शामिल हो गए. अंग्रेज लेफ्टीनेंट अलेक्जेंडर ने देशी पलटन को बागियों पर गोली चलाने का हुक्म दिया, लेकिन सैनिक पहले ही विद्रोह कर चुके थे, उन्होंने क्रांतिकारियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया. कुछ ही देर में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के गोला बारूद, खजाने पर कब्जा कर लिया.

लियाकत अली ने चलाई 10 दिन तक सरकार

मौलवी लियाकत अली ने अंग्रेजों को पराजित करने के बाद खुसरोबाग से ही 10 दिन तक सरकार चलाई. उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों के पद क्रांतिकारियों को दे दिए, चायल का तहसीलदार सैफुल्ला और सुखराम को बनाया गया. नियामत अशरफ और कासिम अली को कोतवाल की पदवी दी गई. उन्होंने भारवा के जमींदार फैजुल्ला खां को सैनिक अधिकारी बनाया.

बनारस से सेना लेकर आया कर्नल नील

ब्रिटिश अफसरों में कर्नल नील को सबसे ज्यादा निर्दयी माना जाता था, प्रयागराज पर जब क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया तो बनारस से कर्नल नील को ही यहां भेजा गया, बहुत बड़ी सेना लेकर आए कर्नल नील ने यहां आते ही कत्लेआम मचा दिया. सुखराम और सैफुल्ला को सरे राह पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई. अन्य क्रांतिकारियों पर भी जुल्म किए गए, क्रांतिकारियों का सहयोग करने वालों को भी सजा दी गई. 18 जून को अंग्रेजों ने फिर से प्रयागराज पर कब्जा कर लिया.

बच निकले लियाकत अली

अंग्रेजों ने प्रयागराज पर कब्जा कर लिया था, लेकिन उनकी निगाह खुशरोबाग पर थी, ऐसे में कर्नल नील ने पूरी ताकत के साथ खुशरोबाग पर हमला बोला, यहां मौलवी लियाकत अली ने काफी देर तक अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया, जब ये तय हो गया कि इस लड़ाई में क्रांतिकारियों की हार होगी तो लियाकत अली को वहां से दूसरी जगह भेज दिया गया, ताकि वे अंग्रेजों के हाथ न आ सकें.

अंग्रेजों ने रखा पांच हजार ईनाम

मौलवी लियाकत अली को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने उस वक्त पांच हजार रुपये का ईनाम घोषित किया था, उन्हें बागी के नाम से पुकारा जाता था, इलाहाबाद संग्रहालय में दर्ज इतिहास के मुताबिक अंग्रेजों ने लियाकत अली की फाइल बागी के नाम से बनाई थी, आज भी ये फाइल अभिलेखागार में है. तकरीबन 24 साल बाद 1871 में सूरत जिले से उन्हें पकड़ लिया गया था. इसके बाद उन पर मुकदमा चला और अंडमान जेल में कालापानी की सजा पर उन्हें भेज दिया गया. 1881 में जेल में वह शहीद हो गए.

1930 के बाद फिर उखड़ने लगे थे अंग्रेजों के पैर

1930 के बाद एक बार फिर अंग्रेजों के पैर प्रयागराज से उखड़ने लगे थे, चार जनवरी 1932 को गांधी जी गिरफ्तारी के बाद इलाहाबाद में पूर्ण हड़ताल घोषित कर दी गई थी, अंग्रेजों के विरोध में जुलूस और सभाओं का सिलसिला तेज हो गया था. रविचंद्र गुप्ता की ओर से लिखित शहीद बच्चों की गौरव गाथा पुस्तक के मुताबिक 1942 में 13 वर्षीय किशोर रमेश दत्त मालवीय को तिरंगा फहराने के प्रयास में अंग्रेजों ने गोली मार दी थी, इसके बाद शहर के क्रांतिकारी खौल उठे थे. इसके विरोध में एक जुलूस भी निकाला गया, इसकी सूचना पर अंग्रेजों ने इसे रोकने की कोशिश की और न रुकने पर फायरिंग की गई. इस गोलीकांड में दो क्रांतिकारी शहीद हुए और तमाम घायल हुए. इसके बाद क्रांतिकारी घटनाओं में और तेजी आई और अंग्रेजों के पैर धीरे-धीरे उखड़ते चले गए.

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Azadi Ka Amrit Mahotsav :1857 में 11 दिन आजाद रहा था प्रयागराज, कर्नल नील ने बनारस से आकर किया था दोबारा कब्जा, 1930 के बाद फिर उखड़ने लगे थे अंग्रेजों के पैर
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