गुलामी नहीं स्वीकारी तो अंग्रेजों ने तोप से उड़ाकर दी थी गोंडवाना साम्राज्य के राजा और उनके पुत्र को मौत की सजा

हिंदुस्तान को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए हजारों लाखों ने अपना बलिदान दिया, ऐसे क्रांतिवीरों में गोंडवाना साम्राज्य के राजा शं...
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हिंदुस्तान को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए हजारों लाखों ने अपना बलिदान दिया, ऐसे क्रांतिवीरों में गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह का भी नाम दर्ज है, इन दोनों ही राजाओं ने गुलामी स्वीकार करने की बजाय हंसते-हंसते मौत को लगे लगाना ज्यादा बेहतर समझा, 18 सितंबर 1857 को इन दोनों ही राजाओं को तोप के मुंह पर बांधकर जिंंदा उड़ा दिया गया.

जनता के बीच लोकप्रिय थे राजा शंकर शाह

हिंदुस्तान का दिल कहे जाने वाले मध्य भारत के प्राचीन क्षेत्र गोंडवाना की माटी ने हजारों वीर सपूतों को जन्म दिया है. जो देश की आन, बान और शान के लिए कुर्बान हो गए. इनमें से कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने न केवल अपना बलिदान दिया बल्कि अपने बलिदान से स्वतंत्रता की ऐसी चिंगारी को जन्म दिया जो बाद में अंग्रेजों के लिए आग बन गई. मध्य प्रदेश के तत्कालीन गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह भी ऐसे ही क्रांतिवीर रहे. राजा शंकर शाह, निजाम शाह के प्रपौत्र तथा सुमेर शाह के एकमात्र पुत्र थे. वह जमींदारों तथा आम जनता के बीच काफी लोकप्रिय थे. TV9 की इस खास सीरीज में आज हम आपको उन्हीं के शौर्य की गाथा बता रहे हैं.

कविताओं के जरिए लोगों में भरी क्रांति की भावना

तोप के सामने किसी को जिंदा बांधकर उसके चीथड़े उड़ा देना अंग्रेजों के लिए नई बात नही थी, लेकिन मौत के सामने भी अपनी कविताओं के जरिए लोगों में क्रांति की भावना भरना इन्हीं के लिए संभव था. गोंड वंश के राजा शंकरशाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह ने उस दौरान अंग्रेजो के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था, जब कई बड़ी-बड़ीी रियासतें अंग्रेजों के सामने कमजोर साबित हो रही थीं, जबलपुर में अंग्रेजों की पकड़ लगातार बढ़ती जा रही थी. अंग्रेज चाहते थे कि जबलपुर से पूरे महाकौशल में कंपनी का वर्चस्व फैल जाए, लेकिन राजा शंकर शाह को यह मंजूर नहीं था.

गुप्तचरों को साधु समझ खोल दिया भेद

जबलपुर में तैनात अंग्रेजों की 52वीं रेजीमेन्ट का कमांडर ले.ज. क्लार्क बड़ा अत्याचारी था. उसने छोटे-छोटे राजाओं और आम जनता को बहुत परेशान कर रखा था. चारों ओर अनाचार और व्यभिचार का बोलबाला था. ऐसे में राजा शंकर शाह ने जनता और जमींदारों को साथ लेकर क्लार्क के अत्याचारों को खत्म करने के लिए संघर्ष का ऐलान किया. उधर क्लार्क ने अपने गुप्तचरों को साधु वेश में शंकर शाह की तैयारी की खबर लेने गढ़पुरबा महल में भेजा. चूंकि राजा शंकर शाह धर्मप्रेमी थे, इसलिए उन्होंने साधुवेश में आए गुप्तचरों का न केवल स्वागत-सत्कार किया बल्कि उनसे निवेदन किया कि वे स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दें. राजा ने युद्ध की योजना भी उन गुप्तचरों के सामने रख दी. परन्तु वही “साधु” रात को 52वीं रेजीमेन्ट के ले.ज. क्लार्क के सामने पहुंच गए और राजा की योजना बता दी कि दो दिन के बाद राजा शंकर शाह 52वीं रेजीमेन्ट की छावनी पर आक्रमण करेंगे. अंग्रेजों ने तुरन्त गढ़पुरबा महल को चारों तरफ से घेर लिया. वह 14 सितम्बर, 1857 का दिन था. राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह को बन्दी बना लिया गया.

विद्रोहियों ने जलाए अंग्रेजों के बंगले

पिता-पुत्र की गिरफ्तारी से पूरे जबलपुर में सनसनी फैल गयी और 15 सितंबर को पूरे दिन गढ़ा मंडला से शंकर शाह के वफादार साथी और जमींदार असलहों के साथ पैदल, घोड़े बग्घियों और बैलगाड़ियों से जबलपुर पहुंचने लगे. 15 सितंबर की रात में शंकर शाह के वफ़ादारों ने राजा शंकर शाह को छुड़ाने के लिए सैनिक छावनी पर हमला करने का प्लान बनाया लेकिन किसी गद्दार व्यक्ति ने इस प्लान की जानकारी अंग्रेज़ डिप्टी कमिश्ननर तक पहुंचा दी. जब विद्रोही सैनिकों और लोगों ने छावनी पर हमला किया तो पहले से तैयार मद्रास इंफेंटरी के अंग्रेजी सैनिको ने उसे विफल कर दिया. बहुत सारे लोग मारे गए लेकिन विद्रोहियों ने अंग्रेजों के कई बंगले जला दिये और कई अंग्रेजी सैनिकों को मौत के घाट सुला दिया लेकिन वे बाप और बेटे को आज़ाद नहीं करा पाए.

मृत्यु दण्ड की सजा का ऐलान

शंकर शाह और रघुनाथ शाह की गिरफ्तारी के बाद हुई जांच में शंकर शाह द्वारा लिखित कविता के अँग्रेजी अनुवाद को आधार मानकर जबलपुर के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में एक डिप्टी कमिश्नर और दो अन्य अंग्रेज़ अधिकारियों के जांच आयोग के सामने शंकर शाह और रघुनाथ शाह की पेशी हुई और उनपर मुकदमा चला. आनन फानन में बाप बेटे को अपराधी साबित करते हुए दोनों को तुरंत मृत्यु दण्ड की सजा सुना दी गयी. मृत्युदंड पर अमल करते हुए 18 सितंबर, 1857 की सुबह शूरवीर पिता और बहादुर बेटे को जबलपुर छावनी परिसर में दो अलग अलग तोपों के मुंह पर बांध दिया गया। जैसे ही जल्लाद ने तोप के गोलों में आग लगाई वैसे ही पिता-पुत्र दोनों के शरीर तोप के धमाकों से चीथड़े- चीथड़े हो गए और पूरा वातावरण दहशत से भर गया. भारत के इतिहास में इतना बर्बर और अमानवीय व्यवहार किसी भी अन्य राजा के साथ नहीं हुआ जितना की इस कोइतूर समाज के पिता-पुत्र के साथ हुआ.

रानी ने किया मुकाबला

तोप के बारूदी गोले की मार से पिता-पुत्र, दोनों के शव पूरे मैदान में बिखर गए थे. रानी फूलकुंवर ने किसी तरह अपने पति और बेटे की लाश के टुकड़ों को इकट्ठा किया और उन्हे नर्मदा के किनारे दफना कर अंग्रेजों से बदला लेने के लिए निकल पड़ी. मर्दाना भेष में रानी फूल कुँवर ने अपने वफादार सैनिकों के साथ रामगढ़ किले को अपने अधिकार में किया और कई स्थानों पर अंग्रेजों को पीछे धकेला. उन्होंने अंग्रेजी सेना के कई सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया. एक एक कर उनके साथी सैनिक मरते जा रहे थे और वे एक अकेली अँग्रेजी सैनिकों से लोहा ले रही थीं और अंत में लड़ते लड़ते घोड़े से गिर गयी. उनके गिरते ही अंग्रेज़ सैनिकों ने उन्हे घेर लिया। अपनी इज्ज़त को बचाने के लिए उन्होने तुरंत अपना खंजर निकाल कर अपने ही सीने में भोंक लिया. घायल अवस्था में उन्हें जबलपुर छावनी में लाया गया जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली इस तरह गढ़ा मंडला में सैकड़ों साल बाद एक और इतिहास दोहराया गया. रानी दुर्गावती के बाद रानी फूलकुंवर दूसरी महिला थीं जिन्होंने अपनी आन बान और शान के लिए स्वयं अपनी जान ले ली लेकिन अंग्रेजों से हार स्वीकार नहीं की. आज भी रानी फूलकुंवर के किस्से और गीत मंडला और जबलपुर के आसपास सुने जाते हैं।

चिंगारी बन गई शोला

इतिहासकार आनंद राणा बताते हैं कि राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों की दर्दनाक मौत को हंसते-हंसते स्वीकार कर लिया लेकिन अंग्रेजों के सामने झुकना पसंद नहीं किया. 1857 में हुई इस घटना के बाद पूरे गोंडवाना साम्राज्य में अंग्रेजो के खिलाफ बगावत शुरू हो गई. शंकर शाह रघुनाथ शाह के बलिदान ने लोगों के मन में अंग्रेजो के खिलाफ एक ऐसी चिंगारी को जन्म दे दिया जो बाद में शोला बन गई. लेकिन हैरानी की बात यह है इन वीर सपूतों को इतिहास के पन्नों में जो जगह मिलना चाहिए थी वह आज भी नहीं मिल पाई है. लेकिन इसके लिए इतिहासकार प्रयास जरूर कर रहे हैं. डॉ.राणा ने बताया कि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के अंतर्गत इतिहास के पुनर्लेखन में यह सभी भूले बिसरे तथ्य शामिल हो रहे हैं.

देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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राष्ट्रीय समाचार: गुलामी नहीं स्वीकारी तो अंग्रेजों ने तोप से उड़ाकर दी थी गोंडवाना साम्राज्य के राजा और उनके पुत्र को मौत की सजा
गुलामी नहीं स्वीकारी तो अंग्रेजों ने तोप से उड़ाकर दी थी गोंडवाना साम्राज्य के राजा और उनके पुत्र को मौत की सजा
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