साउथ अफ्रीका ने इतनी जल्दी ओमिक्रॉन को कैसे दी मात, भारत को उसके ‘T-प्लान’ से सीख लेने की जरूरत?

लापरवाही और कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन की वजह से देश में संक्रमण के आंकड़े फिर बेतहाशा तेजी से बढ़ने लगे हैं. और जिस अनहोनी का डर था, वो...
Omicron

लापरवाही और कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन की वजह से देश में संक्रमण के आंकड़े फिर बेतहाशा तेजी से बढ़ने लगे हैं. और जिस अनहोनी का डर था, वो हो गई है. तीसरी लहर की शुरुआत हो चुकी है. कोविड टॉस्क फोर्स के चीफ डॉक्टर एनके अरोड़ा ने कहा है कि भारत में तीसरी लहर आ चुकी है. नया वेरिएंट इसमें सबसे ज्यादा हावी है और यह ओमिक्रॉन ही है.

मतलब ये कि कल तक जो आशंका जताई जा रही थी, आज उस पर मुहर लग गई है. देश संक्रमण की उस लहर में दाखिल हो गया है, जो रिकॉर्ड कहर बरपा सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि वेरिएंट का पता लगाने के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग करनी होती है और भारत में इसके लिए लैब कम हैं, इस वजह से टेस्टिंग भी कम हो रही है और आंकड़े भी कम आ रहे हैं, लेकिन हकीकत में ओमिक्रॉन के केस बहुत ज्यादा हैं और अगर इसी रफ्तार से बढ़ते रहे, तो तीसरी लहर का पीक आने पर दूसरी लहर के मुकाबले 4 से 5 गुना ज्यादा केस सामने होंगे.

दूसरी लहर के पीक के दौरान भारत में हर रोज 4 लाख के करीब नए केस आ रहे थे. इनमें से करीब 25 हजार को हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा था, लेकिन ओमिक्रॉन को डेल्टा से 5 गुना तक ज्यादा खतरनाक बताया जा रहा है. इस हिसाब से ओमिक्रॉन की वजह से रोजाना 16 से 20 लाख तक नए केसे आ सकते हैं और इनमें से 40 से 60 हजार को हॉस्पिटलाइज करना होगा. अब आप सोचिए, दूसरी लहर के पीक में जब डेली 4 लाख केस थे और उनमें से 25 हजार लोगों को डेली हॉस्पिटलाइज करना पड़ रहा था, तब आपने स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल देखा ही था. अस्पतालों में बेड नहीं थे. मरीज तड़प रहे थे. ऑक्सीजन की किल्लत हो गई थी. एक-एक सांस के लिए जद्दोजहद करते-करते एक-एक करके लाखों जिंदगियां मौत से जंग हार गईं. श्मशान और कब्रिस्तान लाशों से पट गए थे. सोचिए, जब तीसरी लहर में उससे 4 से 5 गुना ज्यादा मामले सामने आएंगे. तो हालात कितने भयावह हो सकते हैं. इसका अंदाजा देश के कुछ बड़े वैज्ञानिकों के थर्ड वेव को लेकर अनुमानों के आधार पर लगा सकते हैं.

फरवरी आते-आते डेली 2 लाख केस आना शुरू हो सकते हैं

नीति आयोग के सदस्य डॉक्टर वीके पॉल ने ओमिक्रॉन आने के बाद जिस तरह देश में केस बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए और ओमिक्रॉन के ब्रिटेन में अटैक के पैटर्न को स्टडी करने के बाद कहा कि देश में हर दिन 14 लाख तक केस सामने आ सकते हैं. उधर ICMR के पूर्व Head Scientist of Epidemiology & communicable diseases डॉक्टर रमन गंगाखेडकर ने इंटरव्यू में कहा है कि थर्ड वेव का पीक इसी महीने के अंत तक आ जाएगा. जिसमें दूसरी लहर के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे. पहली और दूसरी लहर में अपने मैथमेटिकल मॉडल के आधार पर काफी सटीक भविष्यवाणी करने वाले IIT कानपुर के प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल के मुताबिक 3 फरवरी को तीसरी लहर के केस पीक पर होंगे और फरवरी आते-आते डेली 2 लाख केस आना शुरू हो सकते हैं.

नेशनल कोविड-19 सुपरमॉडल कमेटी के चीफ और IIT हैदराबाद के प्रोफेसर डॉक्टर विद्यासागर भी फरवरी में पीक आने और रोज 1 लाख 80 हजार केस आने की बात कह चुके हैं. साफ है कि ना तो कोरोना की तीसरी लहर को आने से रोका जा सका है और ना ही उसके पीक को आने से रोका जा सकता है, लेकिन पीक में संक्रमण के आंकड़ों का पहाड़ खड़े होने से जरूर रोका जा सकता है. अब आप पूछेंगे कि कैसे, तो जवाब है साउथ अफ्रीका. जहां ओमिक्रॉन से की वजह से आई संक्रमण की सुनामी शांत सी पड़ गई है. एक ओर दुनिया भर में ओमिक्रॉन के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन साउथ अफ्रीका में कोरोना का पीक गुजर चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि अफ्रीका ने इतनी जल्दी ओमिक्रॉन को कैसे मात दी है और हिंदुस्तान को क्या सीख लेने की जरूरत है.

साउथ अफ्रीका, जहां से निकले ओमिक्रॉन ने पूरी दुनिया में संक्रमण की सुनामी ला दी है. उस साउथ अफ्रीका में संक्रमण नियंत्रण में आ गया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ओमिक्रॉन से संक्रमण अपने पीक को पार कर गया है क्योंकि ये पीक को पार कर गया है, इसलिए अब आशंका नहीं है कि ये पीक के पार जाएगा. ये सब हुआ सिर्फ एक महीने में. एक महीने में ओंमिक्रॉन पीक पर पहुंचा और पीक ओवर भी हो गया इसलिए सवाल ये है कि ओमिक्रॉन को 1 महीने में कंट्रोल करने का फॉर्मूला क्या है?

क्या है साउथ अफ्रीका का ‘T-प्लान’

इस सवाल का जवाब मिला है दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में, जिससे पता चला है कि साउथ अफ्रीका ने ‘T-प्लान’
से ओमिक्रॉन का काम तमाम किया! लेकिन ये T-प्लान है क्या, जिसके जरिए साउथ अफ्रीका ने किलर कोरोना के ओमिक्रॉन वेरिएंट को मात दे दी. केपटाउन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पता चला है कि बोन मैरो में छिपी खास कोशिकाओं ‘T-सेल्स’ से साउथ अफ्रीका में ओमिक्रॉन हारा. हमारे शरीर में दो तरह की व्हाइट ब्लड सेल, B सेल्स और T सेल्स होती हैं. अगर वायरस से एंटीबॉडी हार भी जाए तो भी B सेल्स बीमारी की पहचान करती हैं और T सेल्स वायरस से लड़ने का काम करती हैं.

केपटाउन यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक 70 से 80 फीसदी मरीजों में मौजूद T सेल्स ने वायरस के खिलाफ अच्छा रिस्पॉन्स किया. किसी भी वायरस के खिलाफ T सेल्स तब डेवलप होती हैं, जब या तो कोई उससे संक्रमित हो चुका हो या फिर वैक्सीन लगवा चुका हो. साउथ अफ्रीका की सरकार ने लोगों का T सेल रिस्पॉन्स मजबूत करने के लिए वैक्सीनेशन को तेज किया और नतीजा सबके सामने है. भले ही वहां बीच में संक्रमण में बेतहाशा उछाल आया, लेकिन मौत के आंकड़े कंट्रोल में रहे. और अब संक्रमण भी काबू में आ गया है.

अभी आपने जिस रिसर्च के हवाले से तैयार रिपोर्ट देखी, वो रिसर्च साउथ अफ्रीका के गाउटेंग प्रांत में की गई. गाउतेंग प्रांत वही जगह है, जहां साउथ अफ्रीका का सबसे पहला ओमिक्रॉन केस सामने आया था. पहले वहां हालात बेकाबू होना शुरू हुआ और फिर पूरे साउथ अफ्रीका में..लेकिन अब फिर से हालात काबू में आते दिख रहे हैं. ओमिक्रॉन को रोकने के लिए साउथ अफ्रीका ने सबसे पहले टेस्टिंग बढ़ाई और मरीज के संपर्क में आने वालों को ट्रेस करके आइसोलेट करने का काम किया गया. कंटेनमेंट जोन में सख्ती से पाबंदियों का पालन कराया गया. नाइट कर्फ्यू भी लगाया. इसके साथ वैक्सीनेशन को बढ़ाने का काम भी किया, जिससे एक ओर तो संक्रमण कम हुआ, तो दूसरी ओर ओमिक्रॉन के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी.

इन तीनों ही मोर्चों पर हमारे देश में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी जानी चाहिए. खासतौर पर वैक्सीनेशन के मोर्चे पर, जिसमें हम साउथ अफ्रीका से बहुत आगे हैं, लेकिन हमें इस गुमान में नहीं रहना चाहिए. क्योंकि अभी भी आबादी का बड़ा हिस्सा फुली वैक्सीनेटेड नहीं है और इस बीच प्रीकॉशन डोज यानी बूस्टर डोज की भी जरूरत आ पड़ी है. इसलिए बूस्टर डोज के साथ जल्द से जल्द सबको वैक्सीनेट करने की बहुत जरूरत है.

दरअसल, साउथ अफ्रीका में ओमिक्रॉन के हारने के पीछे जिन T-सेल्स का बहुत अहम रोल रहा है, वो वैक्सीन लगने के बाद एक्टिव होती हैं. लेकिन कई बार इन T-सेल्स की वायरस को पहचानने की शक्ति कमजोर पड़ने लगती है. ऐसे में T-सेल्स को मजबूत करने के लिए वैक्सीन की दूसरी डोज या बूस्टर डोज देने की जरूरत पड़ती है. साउथ अफ्रीका ने तो ओमिक्रॉन पर काबू पा लिया. लेकिन दुनिया के दूसरे मुल्कों में ओमिक्रॉन खतरनाक स्पीड से बढ़ रहा है. अमेरिका में एक दिन में कोरोना के 10 लाख से ज्यादा केस सामने आए. पहले के मुकाबले अब तीन गुना ज्यादा केस डिटेक्ट हो रहे हैं. एक बड़ा डेवलपमेंट चीन में भी हुआ. चीन ने 12 लाख की आबादी वाले यूझोऊ शहर में कंप्लीट लॉकडाउन लगा दिया और ये फैसला सिर्फ इसलिए लिया गया क्योंकि इस शहर में सिर्फ तीन मरीज़ों में कोरोना मिला था.

ICMR ने भारत की पहली स्वदेशी किट OmiSure को मंजूरी दे दी

ऑस्ट्रेलिया में कोरोना का रिकॉर्ड टूटा है. एक दिन में 47 हजार 799 नए केस सामने आए हैं. हॉस्पिटल्स में 1344 पेशेंट्स भर्ती हैं. ब्रिटेन में 1 लाख 57 हजार से ज्यादा नए मामले सामने आए. अस्पताल में ज्यादातर वो मरीज़ पहुंच रहे हैं, जिन्होंने वैक्सीन नहीं लगवाई और अब ये लोग कह रहे हैं कि उनसे गलती हो गई. ऐसी गलती कोई ना करे. सब वैक्सीन लगवाएं. अब आपको एक गुड न्यूज बताते हैं. कोरोना से लड़ाई में भारत ने एक और मामले में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है. कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन की जांच के लिए ICMR ने भारत की पहली स्वदेशी किट OmiSure को मंजूरी दे दी है. OmiSure किट को टाटा मेडिकल ने तैयार किया है, जिसको 30 दिसंबर को ICMR की ओर से मंजूरी दी गई.

इस किट से जांच में भी नाक या मुंह से स्वाब लिया जाएगा, जैसा कि बाकी RT-PCR टेस्ट में होता है, लेकिन खास बात ये है कि इससे 10-15 मिनट में ही रिजल्ट मिल जाएगा, जैसा कि अभी तक नहीं होता था. इससे पहले अमेरिकी कंपनी थर्मो फिशर की मल्टीप्लेक्स किट से कोरोना की जांच हो रही थी, जो थोड़ी महंगी थी, जबकि OmiSure किट की कीमत 240 रुपये है. ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया भारत बायोटेक कंपनी की नेजल वैक्सीन को बूस्टर डोज के तौर पर मंजूरी दे सकता है कंपनी ने इसके लिए सरकार से मंजूरी मांगी है. भारत बायोटेक का कहना है कि दो डोज लगवा चुके लोगों को अगर बूस्टर डोज दिया जाता है तो उसकी नेजल वैक्सीन अच्छा विकल्प साबित हो सकती है.

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देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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साउथ अफ्रीका ने इतनी जल्दी ओमिक्रॉन को कैसे दी मात, भारत को उसके ‘T-प्लान’ से सीख लेने की जरूरत?
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