सिनेमाघर छूटे लेकिन सिनेमा ने कश्मीर को कभी नहीं छोड़ा…कहानी घाटी के पहले मल्टीप्लेक्स की

कश्मीर घाटी में जहां एक समय में श्रीनगर में 10 से अधिक सिनेमाघर चल रहे थे, वहीं 90 के दशक की शुरुआत के साथ ही आतंकियों द्वारा इन पर ताबड़तो...
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कश्मीर घाटी में जहां एक समय में श्रीनगर में 10 से अधिक सिनेमाघर चल रहे थे, वहीं 90 के दशक की शुरुआत के साथ ही आतंकियों द्वारा इन पर ताबड़तोड़ हुए हमले ने आहिस्ता आहिस्ता इन सिनेमाघरों पर ताले लगा दिए. भले ही लोग ये कहें कि आजादी के बाद से अब पहला मल्टीप्लेक्स सिनेमा घाटी में खुला है लेकिन सच्चाई ये है कि बम, बवाल और बंदूकबाजी ने भले ही सिनेमाघरों पर ताले लगा दिए थे, लेकिन सिनेमा ने वादी से कभी नाता नहीं तोड़ा.

इस मल्टीप्लेक्स को खोलना धर परिवार के लिए एक सपना था. इस मल्टीप्लेक्स के मालिक का कहना है कि उनके 30 वर्षों से देखा जाने वाला सपना आखिर पूरा हुआ है. कश्मीर में पहली बार खुले मल्टीप्लेक्स के मालिक विकास धर से TV9 भारतवर्ष ने खास बातचीत की.

सवाल: आपको कश्मीर में मल्टीप्लेक्स खोलने के पीछे क्या सोच थी

विकास: दरअसल मेरे वालिद साहब यहां “ब्रॉडवे” सिनेमा चलाया करते थे जो एक शानदार सेनिमा हॉल था. एक समय बाद वह सिनेमा बंद हो गया. 30 साल से मेरे दिमाग में था कि मनोरंजन के लिए यहां पर कुछ करना पड़ेगा. फिर 2-3 साल पहले हमने बैठक करना शुरू किया. यहां क्या-क्या एवन्यू हैं, क्या-क्या चीजें यहां पर मनोरंजन के तौर पर लाई जा सकती हैं. हमने सोचा कि हमारा जो प्रोजेक्ट पहले ही था वैसा ही एक प्रोजेक्ट कश्मीर में वापस लाना होगा. दूसरी सोच यह थी कि सिनेमा ने कश्मीर को कभी नहीं छोड़ा, आप देखेंगे कि यहां हर बार शूटिंग होती रही, लोग आते रहे, फिल्म स्टार्स आते रहे बल्कि कई फिल्म स्टार्स तो ऐसे हैं जो कश्मीर के साथ जुड़े हुए हैं. उनसे आप कभी पूछिए कि उन्हें स्विजरलैंड अच्छा लगता है या कश्मीर तो वह कहते हैं उन्हें कश्मीर जाना अच्छा लगता है. कश्मीरी लोगों के दिल से भी सेनमा को कभी नहीं छोड़ा था.

सवाल: क्या आपको लगता हैं कश्मीर के लोग इस मल्टीप्लेक्स में मूवी देखने आएंगे?

विकास: मुझे लगता है जरूर आएंगे. फिल्में बनती किस लिए हैं? बड़े पर्दे पर बड़ा सपना देखने के लिए, अपने मनपसंद एक्टर्स की आवाज गूंजते हुए देखने के लिए. यह इस चीज के लिए अपने फेवरिट एक्टरस को बड़े परदे पर देखने के लिए. इसके लिए फिल्म देखने का सेनेमा हॉल में एक अलग ही मजा है. दूसरा आपने कहा कि आज का दौर इंटरनेट का है. मैं कहता हूं, नेटफ्लिक्स हैं, एमेजॉन हैं, ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, इनमें जो कॉन्टेंट हैं वह रेगुलेटेड नहीं होता और सिनेमा हॉल में मैं समझता हूं “इंडियन सेंसर बोर्ड” हैं जोकि विश्व के स्ट्रिक्ट सेंसर बोर्डस में से एक है. यहां पर जो आपको दिखाया जाएगा वह सारा रेगुलेटेड कॉन्टेंट होगा तो मुझे लगता हैं कुल मिलाकर पूरे परिवार के मनोरंजन के लिए यह एक फुल डेस्टिनेशन बनने का संभावना है.

सवाल: आपके बचपन में सिनेमा से जुड़ी कोई ऐसी याद?

विकास: एक बार की बात है, जब हम एयरपोर्ट जा रहे थे तो अमिताभ बच्चन साहब कहीं से शूटिंग करके आ रहे थे. इस दौरान उन्होंने जैकट पहनी थी. शायद यही जैकेट उन्होंने ‘सिलसिला’ या ‘कभी कभी’ में पहनी थी. एयरपोर्ट पर उन्हें देख मुझे ऐसा लगा कि मैं एक सपना देख रहा हूं कि अमिताभ बच्चन को मैंने रियल लाइफ में देख लिया. एक कहानी और है. मुझे एक बार अंतरराष्ट्रीय सफर का मौका मिला था. उस समय मैं काफी छोटा था. जब मैं वहां से वापस आया और हमारा प्लेन लैंड किया तो मैं प्लेन से बाहर निकलते ही मैंने अपना सर झुलाया, माथा टेका और कहा “सरजमीने हिंदुस्तान को बादशाह खान का सलाम”. इसके बाद मैं आसपास देख रहा था कि कहीं लोग मुझे बेवकूफ तो नहीं समझ रहे. लेकिन लोग समझे क्योंकि उस समय क्रेज इतना था मूवीज का और आज भी है. तब अमिताभ बच्चन साहब थे और आज तीन खान और भी बहुत नए नए एक्टर आ रहे हैं.

सवाल: सुरक्षा व्यवस्था के नजर से आपको क्या लगता हैं

विकास: हमने अपना मल्टीप्लेक्स शिवपुरा जैसे इलाके में सेटअप किया है जो सिक्योर जोन हैं. प्रदेश सरकार समेत जम्मू कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ सब आते हैं. उन्होंने हमें आश्वसन दिया है कि वह हमारे मल्टीप्लेक्स को सुरक्षा देंगे. हमारी निजी सिक्योरिटी भी होगी पर जब आप लोगों के बेनिफिट के लिए कुछ कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता है कि हमें सुरक्षा के लिहाज से चिंतित होने की कोई जरूरत है.

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